निर्भया से पहले और निर्भया के बाद 

निर्भया से पहले और निर्भया के बाद 

आलेख:-राजेंद्र गोदारा
रंगा बिल्ला - गीता चौपड़ा के गुनहगार 
वो मामला जिसने पूरे देश को हिला दिया था 
31 साल पहले हुए विभित्स अपराध का संपूर्ण विवरण 
निर्भया से पहले 
और 
निर्भया के बाद 
निर्भया से पहले किसी एक विभित्स कांड ने अगर पूरे देश को झिंझोड़ कर रख दिया था वो गीता चोपड़ा संजय चोपड़ा हत्याकांड था जिससे पूरा देश खासतौर से देश का युवावर्ग गुस्से में था दुख में था 
गीता संजय चोपड़ा हत्या का क्षोभ इतना अधिक था कि 1978 के 26 अगस्त को ये अपराध हुआ था और उसके बाद तत्कालीन विदेशमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी जब सैंट जिसेस एण्ड मेरी कालेज में किसी कार्मक्रम में गए तो विधार्थीयों ने उन पर पत्थर फैंकें तब के समय राजनितीक घमासान आज के उस स्तर पर नहीं पहुंचा कि राजनेताओं पर पत्थर फैंकना आम बात हो पर वो अपराध इतना क्रूर था और स्टूंडेंट इतने गुस्से में थे की उन्होनें वो पत्थरबाजी की अनहोनी कर डाली एक दो पत्थर अटल जी के माथे पर सिर पर भी लगें और खून से उनके कपड़े भीग गए वाजपेयी जी व्यवहार में कितने सोम्य सज्जन थे उसका पता इसी बात से चलता है कि उन्होनें छात्रों के गुस्से को जायज माना और कालेज प्रशासन को छात्रों पर अनुशासन की कार्यवाही करने से सख्ताई से मना किया 
26 अगस्त 1978 को घटित इस नृशंष घटना के अपराधी थे मुंबई तत्कालीन बंबई के दो गुंडे रंगा और बिल्ला जो चोरी चकारी से लेकर फिरोती तक के घौषित अपराधी पहले से थे इश्तहारी मुजरीम थे 
उस रात जब गीता व संजय चौपड़ा ने आकाशवाणी के इंद्रधनुश कार्यक्रम के लिए रिकार्डिंग करवानी थी तब उनके पिता नेवी केप्टन चौपड़ा ( कुछ जगह उन्हें एडमिरल चौपड़ा भी बताया जाता है ) ने बच्चों से कहा कि आकाशवाणी सेंटर जाओगे कैसे तो गीता  ने कहा आसान है हमेशा की तरह लिफ्ट ले लेंगें भईया साथ है तो डर काहे का आप पापा बस इतना करना की आफिस से आते हुए लेते आना 
उस समय दिल्ली में आवागमन के साधन कम ही होते थे तो दिल्ली में लिफ्ट लेना आम बात थी और सही कहा जाये तो बच्चों में लिफ्ट लेना उस समय एक फैसन था और यही लिफ्ट लेना गीता व संजय के लिए अंतिम लिफ्ट साबित हुई बदकिस्मती से उन्होने जिस फियेट कार को लिफ्ट के लिए रूकने का इशारा किया उस पर घौषित बदमास रंगा और बिल्ला सवार थे गीता चौपड़ा ने देखा गाड़ी में शक्ल से ही बदमास लगने वाले दो जनें थे पर एक तो आकाशवाणी पहुंचने कघ जल्दी दूसरे भाई संजय का साथ होना इससे गीता ने कोई शक या शंका को परे झटक दिया संजय चौपड़ा था तो उस समय मात्र 14 साल का पर सेना में गए पिता आकाश चौपड़ा की तरह गठीले बदन का लंबा तगड़ा गबरू जवान था गीता की उम्र उस समय 16 से कुछ अधिक थी पर 
जैसे ही गीता व संजय ने कार में बैठने का उपक्रम किया तो देखा कार की पिछली सीट के दोनों दरवाजों पर ना तो दरवाजा अंदर से खोलने के हैंडल थे ना ही शीशे खोलने के हैंडल थे उसी समय उन्हें कार वालों पर शक हुआ तो दोनों ने शोर मचाना शुरू किया तब बिल्ला व रंगा ने उन्हें मारना पीटना शुरु कर दिया शुरु में रंगा बिल्ला ने उन्हें धनवान परिवार के बच्चे जानकर फिरौती के लिए अपहरण किया था पर जब उन्हें पता लगा कि उनके पिता जलसेना में इतने बड़े अधिकारी है तो वे डर गए रंगा व बिल्ला ने संजय चौपड़ा पर चाकू के लगातार वार किए पर संजय चौपड़ा भी उनसे भीड़ गया 29 अगस्त को जब उनकी लाश मिली तो संजय चौपड़ा पर 21 चाकू के घातक वार किये गए थे 
एक जगह गीता की चीख सुनकर एक स्कुटर चालक भगवान दास की नजर उश पर पड़ी तो उसने फियेट का नंबर याद किया और कार का पिछा करना शुरु किया एक बार जब वो कार के पास गया तो उसने देखा पिछली सीट पर बैठे लड़के की शर्ट खून से सनी हुई थी लड़की ने आगे बैठे गाड़ी के चालक के बाल खींच रखे थे और चालक एक हाथ से गाड़ी चला रहा था दूसरे हाथ से लड़की पर वार कर रहा था आगे बैठा दूसरा आदमी पिछे बैठे लड़के पर चाकू चला रहा था स्ट्रीट लाईट में चाकू की चमक साफ चमक रही थी तभी चालक ने कार को स्कूटर की तरफ काटा तो स्कूटर चालक को स्कुटर पीछे करना पड़ा फिर भी वो कार के पीछे लगा रहा पर आगे लाल बत्ती पर कार नहीं रूकी और स्कुटर चालक पिछड़ गया 
तब उस स्कुटर चालक भगवान दास ने किसी पीसीओ पर रूक कर 100 नंबर पर कार में उस लड़के लड़की के बारे में पुलिस को सुचना उस समय गश्ती पुलिस नाम मात्र की होती थी और गश्त उससे भी कम होती थी 
उधर जब केप्टन चोपड़ा को बच्चे आकाशवाणी भवन के बाहर ना मिले तो वे भीतर गए तब पता चला कि गीता व संजय तो वहां पहुंचे ही नहीं थे तब पुलिस में रिपोर्ट हुई तो भगवान दास वाली कार की कहानी पता चली पर तब तो समय निकल चुका था उस मार्ग कार को ढुंढने की कौशिश हुई पर बहुत देर हो चुकी थी 
29 अगस्त को दिल्ली के बाहर सुनसान जगह पर वो दो लाश मिली तब केप्टन चौपड़ा की शिनाख्त पर पक्का हो गया कि उन दंरिदों के शिकार गीता व संजय चौपड़ा ही थे 
उस समय फौरेन्सिक जांच के नाम पर मुख्य जांच का नाम फिंगर प्रिंटस ही थे कार में जांच की गई तो उस रात हुई भारी बारिस का पानी या सिलाबा कार के अंदर मौजूद ज्यादातर अंगुलियों के निशान मिटा चुका था या धूंधला कर चुका था कुछ निशान आपस में इतने गड्डमड्ड थे की उन्हें कागज पर उतारना ही मुश्कील था पर फिर भी गीता व संजय के अलावा दो भिन्न व्यक्तियों के अंगुलियों के निशान कई स्थानों पर मिले 
तब तक देश में युवा वर्ग आक्रोशित हो चुका था संसद में मामला उठ चुका था एक नोसेना के बड़े अधिकारी के परिवार का मामला था जो सुर्खियों में आ चुका था खुद प्रधानमंत्री मोरार जी देशाई केप्टन चौपड़ा के घर शौक व्यक्त करने गए ये शायद पहला मामला था जब प्रधानमंत्री अपराध के शिकार किसी परिवार के यहां शौक व्यक्त करने गए पर केस तो वहीं का वहीं था 
तब दिल्ली की पुलिस ने दिखाया की वो राजधानी की पुलिस थी तब फिंगर प्रिंट का मिलान का लंबा काम सुरु हूआ जो की अपराधीयों की लंबी चोड़ी लिस्ट से मिलाना एक बहुत समय खाऊ काम था तब किसी अधिकारी ने कहा की दो जनें इकट्ठे मिल कर काम करने वाले अपराधीयों पर विशेष ध्यान देकर उन दो मिल कर अपराध करने वाले अपराधियों की जोड़ी पर ध्यान देकर उनके फिंगर प्रिंटस से मिलाये जाये अपराधियों की जोड़ी का नाम आते ही किसी अधिकारी का ध्यान गया कि 
बंबई में कुलजीत सिंह उर्फ रंगा व जगबीर सिंह उर्फ बिल्ला दो शातिर अपराधी इकट्ठे मिल कर जुर्म करते है और फिरौती के लिए अगवा उनका पसंदिदा जूर्म है तब पता चला कि रंगा बिल्ला के फिंगर प्रिंट तो दिल्ली पुलिस के पास भी उपलब्ध थे जो दिल्ली में की गई किसी वारदात के समय लिए गए थे तब फौरन कार में मिले फिंगर प्रिंटस का मिलाश रंगा बिल्ला के रिकार्ड में उपलब्ध निशान से मिलाए गए तो हुबहू मिलते पाये गए दिल्ली पुलिस की ये बहुत बड़ी कामयाबी थी कघ मात्र अंगुलियों के निशानों के बल पर उन्होनें बंबई के उन कुख्यात अपराधियों की पहचान कर ली थी 
पर अब तो दिल्ली और भी दूर हो चुकी थी रंगा बिल्ला कब के दिल्ली छोड़ चुके थे वो दोनों दिल्ली से इकट्ठे आगरा गए वहां से रंगा बंबई चला गया और उसने वहां भी वारदात की तो बंबई पुलिस को पक्का पता चला कि दिल्ली में इतनी बड़ी वारदात कर चुका अपराधी रंगा फिर से बंबई में है फौरन सुई ढुंढने वाले महीन तरीके से रंगा बिल्ला की तलास सुरू हुई पर तब तक रंगा वापिस आगरा पहूंच चुका था इन अपराधियों के होंसलें देखो की दोनों ने अगली वारदात के लिए फिर दिल्ली जाने का प्लान बनाया 
इस दौरान रंगा बिल्ला के पोस्टर पूरे देश में लगाये गए और उन पर भारी ईनाम घौषित किया गया ये देश में पहला मौका था जब किसी अपराधी के पोस्टर इतने बड़े पैमाने पर पूरे देश में लगे 
उधर रंगा बिल्ला आगरा से दिल्ली के लिए चढे तो रेलवे स्टेशन पर लेट आने पर भाग कर गाड़ी में चढने के चक्कर में सेना के जवानों के लिए आरक्षित डब्बे में चढ गए आगे सेनिकों को देख कर दोनों ने ये दिखाया कि वे भी सेना के जवान है उस समय रंगा बिल्ला ने वर्दी भी सेना के जवानों जैसी पहन रखी थी पर डब्बे में पहले से बैठे जवानों के सुबेदार ने रंगा बिल्ला से कहा कि अगर वे भी सेना के जवान है तो अपना पहचान पत्र दिखाये 
इस पर रंगा ने बिल्ला को कहा की वो उन्हे भरा हुआ पहचान पत्र दिखाये लोडेड आईडी दिखाने को कहा तो जवानों को शक हो गया उन्होने दोनों को पकड़ कर तलासी ली तो उनके पास देशी कट्टे या बिना लाईसेंस की देशी पिस्टल मिली तब सेना के जवान दोनों की पिटाई करने लगे तो रंगा ने बिल्ला को कहा अबकी बार गलत नंबर डायल हो गया जो हो सकता है हमें फांसी के फंदें तक ले जाये सेना के जवानों ने दोनों को रेलवे पुलिस को सौंप दिया तब दिल्ली पुलिस को पता चला कि रंगा बिल्ला से मिलते जुलते दो अपराधी आगरा रेलवे पुलिस के कब्जे में है तब दिल्ली पुलिस ने वहां जाकर उन दोनों की विधिवत पहचान की और दिल्ली ले आई 
08 सितंबर को पकड़े गए रंगा बिल्ला अगले दिन दिल्ली लाए गए लगभग अनपढ दोनों अपराधी कानून के इतने जानकार थे कि गिरफ्तार होते ही उन्होने कहा कि वे मजिस्ट्रेट के आगे इकबालिया बयान देंगें ताकी दिल्ली पुलिस की मार पीटाई से बच सके मजिस्ट्रेट ने आकर उन दोनों को आगाह किया की इकबालिया बयान एक ऐसा ठोस सबूत होता है जो खुद उनके खिलाफ चलेगा और वो दोनों उससे मूकर भी नहीं सकेंगें पर रंगा बिल्ला इकबालिया बयान की जिद पर अड़े रहे 
इकबालिया बयान में दोनों ने स्वीकार किया की गीता व संजय चौपड़ा ने उनसे लिफ्ट मांगी थी और उन दोनों ने उनका अगवा कर लिया पहले उनका ईरादा फिरौती मांगने का ही था पर सेना के इतने बड़े अधिकारी का नाम सुनकर वे डर गए और कार के अंदर संजय चौपड़ा ने उनकी तलवार छिन कर उन पर हमला कर दिया तो उन लोगों को संजय को मारना पड़ा सुनसान इलाके में उन दोनों ने संजय को मारकर गीता चौपड़ा से बलात्कार किया और फिर उसे भी तलवार से मार डाला बयान में हालांकि दोनों ने तलवार से हत्या की बात कबूल की पर पोस्टमाटर्म की रिपोर्ट में इसे चाकू का वार बताया गया 
उस समय हमारी फौरेंसिक जांच किस स्तर की थी उसमें से एक तो यही है की वे चाकू और तलवार में फर्क नहीं कर पाये बाद में डाक्टरों ने साफ कहा कि घाव देखकर ये नहीं बताया जा सकता कि वह घाव चाकू का है या तलवार का इस पर एक बहाना उन्होनैं भंयकर गर्मी में डेड बोडी का खराब हो जाना बताया दूसरा कारण उन्होनें ये बताया की डेड बोडी हत्या के कम से कम 48 घंटे बाद मिलने पर मृतक शरीर का खराब हो जाना बताया गया 
फोंरेंसिक एक्सपर्ट की दूसरी भयंकर गलती ये थी कि उन्होने बताया था कि गीता चौपड़ा के साथ बलात्कार नहीं होना बताया उन्होने स्पष्ठ लिखा था की मृतिका के साथ बद्फेली नहीं हुई पर दोनों अपराधी स्वीकार कर रहे थे कि उन्होने गीता के साथ बलात्कार किया था अदालत में अपने बयानों पर डाक्टरों ने इसका कारण भी डेड बोडी का खराब हो जाना बताया 
दिल्ली पुलिस सबूतों के आधार पर कोई ज्यादा मजबूत केस नहीं बना पाई एकमात्र फिंगर प्रिंट पर निर्भर केस था ये सुरु में रंगा बिल्ला ने इसे केप्टन चौपड़ा के सह अधिकारी के पुत्र का कृत्य बताया जिससे की किसी पार्टी के दौरान गीता का झगड़ा हुआ था पर फिंगर प्रिंट के अकाट्य सबूत के सामने वे दोनों इसे एक दुसरे का कार्य बताते रहे रंगा कहता सबकुछ बिल्ला ने किया वो तो गाड़ी चला रहा था जबकि बिल्ला ने कहा की गीता को देख कर रंगा की नियत खराब हो गई नहीं तो वो तो उनके इतने बड़े अधिकारी का नाम सुनकर वो तो उन दोनों को छोड़ना चाहता था पर रंगा की नियत बिगड़ गई तो उसने गीता से बलात्कार करना चाहा तो संजय उस पर झपट पड़ा तब रंगा ने उसकी हत्या कर दी और फिर गीता से बलात्कार कर उसकी भी हत्या कर दी
अदालत में सबसे बड़ा सबूत रंगा बिल्ला की ज्यादा सयानेपने में दिया गया इकबालिया बयान ही निकला और न्यायलय ने दोनों को फांसी की सजा दी जिसे हाईकोर्ट ने व बादमें सुप्रिम कोर्ट ने भी बरकरार रखा राष्ट्रपति नीलम संजीव रेड्डी ने दया याचिका को साथ के साथ खारिज कर फांसी की सजा को कायम रखा 
तब जाकर चार साल के बाद 1982 में उन दोनों को फकीरा व कालू नाम के जल्लादों ने फांसी देने का काम पूर्ण किया 
अंत में 
अपने आपको बहुत दिलेर व साहसी बताने वाले ये दोनों दंरिंदें फांसी से कितना डरते थे ये बताना चाहूंगा बिल्ला तो तब बेहोश ही हो गया था जब इसे फांसी के फंदे तक ले जाया गया पांच छह सिढीयों के ऊपर फांसी वाले गलियारे में उसे सिढियों पर से घसिट कर ले जाया गया उसी सुबह जब बीबीसी का पत्रकार रंगा से मिला तो वो झुर्री कि तरह कांप रहा था और कह रहा था की सरकार उसे बुखार में भी रियायत नहीं दे रही और फांसी पर टांग देना चाहती है आप बड़े पत्रकार है मेरी मदद करें मुझे फांसी से बचायें 
एक और बात जो उन दोनों के फांसी के 30 साल बाद पता चली कि दोनों को फांसी पर चढाने के दो घंटे बाद जब डाक्टर ने चैक किया तो रंगा तो मर चुका था पर बिल्ला की नब्ज दो घंटें बाद भी चालू थी तब जल्लाद कालू को कहा गया कि वो तख्तें के नीचे जाकर बिल्ला के पांवों को नीचे खींचें तब कालू जल्लाद उसके पांवों पर लटक गया लगभग डेढ क्वींटल भारी कालू के नीचे से खींचते ही उस नर पिसाच की गरदन टूट गई