भाग्य की निर्णायक भूमिका

भाग्य की निर्णायक भूमिका


आलेख:- चन्द्र प्रभा सूद
प्रत्येक मनुष्य को उसके प्रारब्ध या भाग्य के अनुसार ही इस जीवन में सुख-दुख या समृद्धि सब मिलते हैं, न उससे अधिक और न उससे कम। उसके पूर्वजन्म कृत कर्मों के अनुसार ही उसका भाग्य बनता है। उसके घर में किसके भाग्य से धन-दौलत या आती है, यह किसी को भी पता नहीं चलता। पर मनुष्य व्यर्थ ही अहंकार करता है। 
वह सोचता है कि उसने अथक परिश्रम करके सब साधन जुटाए हैं। उसने धन कमाया है इसलिए उस सब पर केवल उसी का ही अधिकार है। परन्तु उसे इस बात का तनिक भी भान नहीं होता कि वह किसके भाग्य से खा और कमा रहा है ।
एक बोधकथा है कि एक आदमी ने नारदमुनि जी से पूछा- "प्रभु! मेरे भाग्य में कितना धन कमाना लिखा है?" 
नारदमुनि ने कहा कि भगवान विष्णु से पूछ कर कल बताऊँगा। अगले दिन उन्होंने उसे बताया कि एक रुपया प्रतिदिन कमाना उसके भाग्य में लिखा है। आदमी बहुत खुश रहने लगा क्योंकि उसकी सारी जरूरतें एक रुपए में पूरी हो जाती थीं। उसके सादे जीवन और प्रसन्न स्वभाव से प्रभावित होकर एक दिन उसके मित्र ने अपनी बहन की शादी का प्रस्ताव उसके समक्ष रखा।
उसने बताया कि उसकी कमाई एक रुपया रोज है। इस बात को ध्यान में रखते हुए ही तुम्हारी बहन को गुजर-बसर करनी पड़ेगी। मित्र ने उस रिश्ते को अपनी मंजूरी दे दी। 
अगले दिन से उस आदमी की कमाई ग्यारह रुपए हो गई। उसने नारदमुनि से पूछा- "उसके भाग्य में एक रुपया लिखा है तो ग्यारह रुपए उसे कैसे मिल रहे हैँ?"
नारदमुनि ने उससे पूछा - "उसका किसी से रिश्ता या सगाई हुई है क्या?" 
उसके हाँ कहने उन्होंने बताया- "उसे वे दस रुपए उसके जीवनसाथी के भाग्य से मिल रहे हैं। इसे जोड़ना शुरू कर दो, ये धन विवाह में काम आएगा।" 
समयानुसार उसकी पत्नी गर्भवती हुई, तो उसकी कमाई इक्कतीस रूपये होने लगी। तब नारदमुनि ने उसे बताया, "अब उसके बच्चे के भाग्य से उसे बीस रुपए अधिक मिलने लगे हैं।"
यह बोधकथा हमें समझा रही है कि घर में जितने भी प्राणी रहते हैं, उन सबका भाग्य जब मिलता रहता है, तो उसी के अनुसार ही मनुष्य को अधिक अधिक सब ऐश्वर्य मिलता रहता है। एक-एक सदस्य के घर-परिवार में आते रहने से मनुष्य के भाग्य का सितारा बुलन्द होता रहता है। सबके सम्मिलित भाग्य से ही वह सफलता के सोपानों को छूता हुआ दिन दोगुनी और रात चौगुनी तरक्की करता जाता है। 
इसके विपरीत यदि घर में आने वाले किसी सदस्य का दुर्भाग्य हो, तो चलता हुआ व्यवसाय बर्बाद हो जाता है अथवा मनुष्य की नौकरी चली जाती है। वह कर्जे में डूब जाता है। घर में बीमारी पीछा नहीं छोड़ती। इस तरह मनुष्य को दुखों की चौतरफा मार को झेलना पड़ता है। उस मैंने मेहनत से कमाया है, कुछ भी काम नहीं आता।
इस प्रकार घर में आने वाले सदस्यों का भाग्य भी निर्णायक की भूमिका निभाता है। सभी का सामूहिक भाग्य ही घर का भाग्य विधाता बनता है। उसी के अनुसार मनुष्य को सुख-समृद्धि और सफलता मिलती है अथवा जीवन में निराशा मिलती है और उसे हार का सामना करना पड़ता है।
इस विवेचना का यह अर्थ कदापि नहीं लगाना चाहिए कि मनुष्य हाथ पर हाथ रखकर निठ्ठला बैठ जाए। वह बस यही सोचता रहे कि जब भाग्य से ही सब मिलना है तो मेहनत क्यों करूँ?
मनुष्य यदि मेहनत नहीं करेगा तो सफलता के लिए आने वाले अवसर को वह पहचान नहीं पाएगा। इस तरह वह उस स्वर्णिम अवसर को खोकर लाचार बना रहेगा। इसे किसी भी तरह से उचित नहीं ठहराया जा सकता।
कर्मठ व कर्मशील मनुष्य भाग्य के भरोसे न बैठकर अपने रास्ते स्वयं बनाते हैं। वे अपने अथक परिश्रम और प्रयत्नों से अन्ततः विजयी बनते हैं। दुखों व परेशानियों की अग्नि में तपकर कुन्दन की तरह चमकते हुए दिखाई देते हैं।
लेखिका परिचय:- (काव्य संग्रह,गद्य और पद्य लेखन),भूतपूर्व शिक्षिका (डीपीएस),स्नातकोत्तर-दिल्ली

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