दूसरों के लिए समर्पण 

दूसरों के लिए समर्पण 

आलेख:- चन्द्र प्रभा सूद
सभी भौतिक सम्बन्ध त्याग की कसौटी पर कसे जाते हैं। मनुष्य दूसरों के लिए कितना समर्पण कर सकता है, यह सबसे अधिक महत्त्वपूर्ण होता है। गम खाने ही उन्हें निभाया जा सकता है अन्यथा उन्हें मोतियों की तरह टूटकर बिखरने मे समय नहीं लगता।
पानी और दूध का रिश्ता स्वयं मे एक उदाहरण होता है। पानी अपने अस्तित्व को दूध में आत्मसात करके अपने स्वरूप को मिटा देता है। उधर दूध पानी का समर्पण देखकर उससे मित्रता कर लेता है। दूध और पानी की इस प्रगाढ़ता को अलग-अलग करना असम्भव होता है। इसीलिए पानी भी दूध के मूल्य पर ही बाजार में बिकता है। 
दूध को उबालाते समय भी पानी अपनी आगे बढ़कर साथ निभाता है। दूध से पहले वह पतीले से बाहर निकलकर गिरता है और आग को बुझाने का प्रयास करता है। जब दूध में पानी का छींटा देते है, तब वह उफनना छोड़कर शान्त हो जाता है।
रिश्ता निभाने वाली इस बेमिसाल जोड़ी को अलग करने का उपाय मनुष्य ने खोज लिया है। इसमें नीम्बू या सिरके की दो-चार बूँदें डाल दी जाएँ, तो दूध फट जाता है। तब दूध व पानी दोनों अलग हो जाते हैं। इसी तरह थोड़ी-सी खटास यदि रिश्तों में आ जाए, तो उनमें अपनापन समाप्त होने लगता है। 
ईमानदार प्रयत्न करना चाहिए कि रिश्तों में खटास न आने पाए। उनमें मधुरता बनी रहे। इससे किसी को कोई फर्क नहीं पड़ता कि हमारे पास कितना धन-वैभव है, कितना बैंक बैलेंस है, कितने घर व गाड़ियाँ हैं। कमोबेश ये सभी भौतिक ऐश्वर्य बहुत लोगों के पास होते हैं। 
न कोई किसी को देता है और न ही कोई किसी से लेता है। आजकल लोग दूसरों की सहायता करने से पहले अपना स्वार्थ ही देखते हैं। मनुष्य को जीने के लिए एक छत, पहनने के लिए दो जोड़ी कपड़े और खाने के लिए दो रोटी चाहिए। उन्हीं के लिए वह सारे छल-प्रपञ्च और षडयन्त्र करता है।
सभी लोग यदि एक-दूसरे से नाराज होकर चुप्पी साध लेंगे तब उनमें अबोलापन बढ़ने लग जाएगा। उसे तोड़ने के लिए किसी को पहल करनी होगी। तो फिर यह पुण्य कार्य आप या मैं भी तो कर सकते हैं। इसी तरह हम सभी एक-दूसरे को रूठते-मनाते रहेंगे तो एक समय ऐसा आएगा जब हमारे पास मनाने के लिए कोई नहीं बचेगा। 
एवंविध मनों में दरार या कोई खाई बन जाएगी, तो उसे पाटने के लिए सबको मिलकर हाथ बढ़ाना पड़ेगा। छोटी-छोटी बातों को दिल पर ले लेने से मनमुटाव बढ़ता है। रिश्ते टूट तो नहीं सकते, इसलिए उन्हें सहृदयतापूर्वक निभाना समझदारी होती है। मनुष्य इस बात को क्यों भूल जाता है कि वह अपने बन्धु-बान्धवों से ही सुशोभित होता है और उन्हीं के साथ से मान पाता है।
इस तरह से रिश्तों को अनावश्यक ही तोड़ा नहीं जा सकता। मनुष्य अपने रिश्तेदारों और सम्बन्धियों के सहयोग से सफलता की सीढ़ियाँ चढ़ता है। गलती हो जाने पर मन को थोड़ा बड़ा करके बन्धु-बान्धवों को क्षमा कर देना चाहिए। नहीं तो उनकी यादें मानस को यदा कदा झिंझोड़ती रहती हैं। यदि सभी लोग अपनी अकड़ में रहेंगे तो धैर्य बंधाने वाला अपने पास कोई नहीं होता। इसलिए अपना बडप्पन दिखाते हुए झूठे अहं की तिलाञ्जलि देना ही बुद्धमानी कहलाती है। 
ईश्वर ने जीवन बहुत सीमित समय के लिए दिया है। पता नहीं कौन पहले इस संसार से विदा लेकर साथ छोड़ देगा? अतः इन पलों को समेट लेना बुद्धिमानी होती है। जब मनुष्य अकेला रह जाता है तब उसका साथ निभाने वाला कोई नहीं होता। उस समय इन्सान पश्चाताप करता है कि समय रहते यदि वह चेत जाता तो अपना कहने के लिए उसके पास कोई तो होता।
व्यवहार में केवल इतना मात्र करना चाहिए कि जीवन में ईश्वर ने जितने भी पल हमारी झोली में डाले हैं, उन्हें सबके साथ ख़ुशी-खुशी साझा करना चाहिए। प्रयास यही करना चाहिए कि यथासम्भव जितने लोगों के चेहरे पर हम मुस्कान ला सकें, लानी चाहिए।
लेखिका परिचय:- (काव्य संग्रह,गद्य और पद्य लेखन),भूतपूर्व शिक्षिका (डीपीएस),स्नातकोत्तर-दिल्ली
 

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