यकीन मानिए यह तस्वीर यूगांडा की नहीं अपने बिहार के भोजपुर कोइलवर की है

यकीन मानिए यह तस्वीर यूगांडा की नहीं अपने बिहार के भोजपुर कोइलवर की है


आलेख:- भीम सिंह भवेश,भोजपुर ब्यूरो चीफ राष्ट्रीय सहारा 
यह तस्वीर युगांडा के किसी अति कुपोषित परिवार की नहीं है। पूर्वी अफ्रिका के गरीब देशों में सुमार यूगांडा एक लैंड लाक (स्थल रुह) देश है, जहाॅ की एक तिहाई जनसंख्या अंतर्राष्ट्रीय गरीबी रेखा {प्रतिदिन 2 अमरेकी डाॅलर (करीब डेढ़ सौ रुपए) से कम आय} से नीचे जीवन यापन करती है। 
यह तस्वीर भोजपुर जिला के उस जगह की है, जहाॅ के उद्योग समूह प्रतिवर्ष सरकार, उसके मंत्री और शासन-प्रशासन के एक इशारे पर सी.एस.आर (कारपोरेट सोशल रिशपाॅसिबलिटी) का आकर्षक आवरण ओढ़ा कर मनचाहा खर्च कर देते हैं। इन कम्पनियों को भान तक नहीं होता कि जहाँ उन्होंने व्यावसायिक का दर्जा देकर उद्योग के इमारत खड़े किए हैं, उस भूभाग का सदुपयोग ये गरीब भी करते थे। यह तस्तीर उस पंचायत की है, जहाँ के उद्योगों का सामूहिक टर्न ओवर प्रतिवर्ष अरबों में है। जी, बात उसी गीधा पंचायत की हो रही है, जहाॅ बियाडा (बिहार इंडस्ट्रियल एरिया विकास अथर्टी) ने सौ एकड़ से अधिक जमीन अधिग्रहित कर उद्योग स्थापित किए हैं। इनमें छोटे-बड़े उद्योग, शिक्षण संस्थान, राइस मिल सहित नवरत्न कम्पनियों की शाखाएं भी हैं। औद्योगिक परिक्षेत्र के कारण यहाँ की सैकड़ो एकड़ कृषि योग्य भूमि अन्य व्यवसायों के लिए भी निजी रूप में खरीद लिए गये हैं। देखते-देखते गीधा पंचायत की कृषि योग्य रकबा काफी सिकुड़ गया। 
आरा-पटना एन एच - 30 मुख्य मार्ग पर अवस्थित गीधा पूर्वी मुसहर टोला की यह तस्वीर है। दोरागा मुसहर की पत्नी छोटकी देवी के साथ उसका अति कुपोषित बेटा सोमारु खड़ा है। एक बेटा बाये उकडू बैठा है। दूसरा माॅ और भाई से सटकर तो बेटी आगे बैठी है। माॅ छोटकी देवी को ठीक से बैठने में परेशानी है, क्योंकि वह कमजोर है। पति मौसमी मजदूरी करते हैं, जिनकी कमाई का एक हिस्सा गीधा पश्चिमी मुसहर टोला में खुलेआम बिकने वाली अवैध शराब में चला जाता है। बेचारी छोटकी देवी अपने अधूरे इंदिरा आवास में आधा दर्जन परिवार के साथ रहती है। दिन में सड़क के किनारे, गली और चबूतरा पर बैठकर समय काटती है। रात में पाॅलिथीन बिछकर समेट लेती है पूरा कुनबा। इस टोला में अतिकुपोषित बच्चे की अभागिन माॅ केवल छोटकी देवी नहीं है। रेखा देवी का पुत्र मुन्ना और सोमरिया के नीतीश कुमार जैसे कई कुपोषित भरे पड़े हैं।
इस टोला में कुल 73 मुसहर परिवार रहते हैं, जिन्हें सरकार महादलित की उपाधि से नवाजी है। सभी परिवार कृषि, निर्माण एवं अन्य क्षेत्रों में मौसमी रोजगार पर अश्रित हैं। इन परिवारों के बीच वर्तमान में एक भी कार्यरत शौचालय नहीं है। यानी खुले में शौचमुक्त (ओडीएफ) अभियान से पूरी तरह अछूती है करीब पौने चार सौ की आबादी। गरीबी इस कदर कि पूरे मुसहर टोला में मात्र दो खटिया और नौ चौकी है। यानी करीब साठ परिवार अधूरे आवास के कच्चे-पक्के जमीन पर सोते हैं। यहाँ इंडियन वायल, हिन्दुस्तान पेट्रोलियम और भारत वायल की रसोई गैस फिलिंग कम्पनी के बावजूद मात्र चार परिवारों के पास ही रसोई गैस कनेक्शन है, जिनमें सिर्फ एक परिवार गैस जलाता है। शेष परिवार पेड़ो की सुखी टहनियाँ, अरहर और तिलहन आदि फसलों के डाॅठ और सड़क के किनारे लगे बेहाया को सुखाकर जलावन के रूप में इस्तेमाल करते हैं। सड़कों के चाट में लगे बारहमासी पौधों से निकलने वाला धुंआ सेहत के लिए काफी खतरनाक माना जाता है। युवाओं के वर्चस्व वाले 12 परिवारों के यहाँ टीवी भी है।
विश्व स्तर पर गरीबी का जो आंकलन यूनाईटेड नेशनस् डेवलाॅपमेंट प्रोग्राम (यू.एन.डी.पी.) के तहत किया जाता है, उनमें तीन आयामों स्वास्थ्य, शिक्षा और जीवन स्तर के दस संकेतक बाल मृत्यु दर, पोषण, स्कूली शिक्षा, नामांकन, जल, स्वच्छता, बिजली, खाना पकाने का इंधन, फर्श और संपति है। इस टोला पर जब इन आयामों और संकेतकों को आधार बनाकर आंकलन करते हैं, तो गरीबी, रोने और सिसकने की बजाए चिघाड़ मारती दिखती है। बाल मृत्युदर के साथ पोषण का घोर अभाव है।
स्कूली शिक्षा एवं एवं कुछ नामांकन महज खानापूर्ति है। दोनों चापाकलों के पास भयंकर गंदगी है। मुहल्ले में खड़े पोल के बावजूद बांस-बल्ले के सहारे बिजली पहुंची है। खाना बनाने का इंधन के नाम पर स्थिति बदतर है। दो तिहाई घरों के फर्श कच्चे हैं। सम्पति के नाम पर औसत घरों में शादी के समय महिलाओं को मिले दो बाई डेढ़ फीट का टीन का बक्सा, अनाज रखने का एक छोटा ड्रम, अल्यूमिनियम के बर्तन, मिट्टी का चूल्हा, बिछावन के बतौर पाॅलिथीन, कम्बल और फटे चादर। वस्त्र के नाम पर दो से अधिक साड़ी वाली महिलाएं और दो से अधिक शर्ट और कमीज वाले पुरूष गिनती के हैं। मच्छरों का घोर प्रकोप के बावजूद पूरे टोला में एक भी मच्छरदानी नहीं है। 
कुपोषित, अतिकुपोषित, गर्भवती एवं घातृ महिलाओं के सर्वाधिक हितैसी विभाग समेकित बाल विकास परियोजना (आईसीडीएस) है। इसी गरीब और कुपोषित वर्ग के निमित्त यह विभाग भोजपुर जिला में प्रति माह औसतन पाॅच से छः करोड़ रूपए खर्च करता है। लेकिन अति निर्धन और कुपोषित लोगों का बसेरा यह मुसहर टोला आई.सी.डी.एस. की सूची में है ही नहीं। पिछले कई सालों से यहाँ के लोगों को टीएचआर(टेक होम राशन) नसीब नहीं हुआ है। पिछले सप्ताह की सूचना के बाद टोला का सर्वेक्षण विभाग करा रहा है लेकिन जाने कब इन गरीबों का सहारा बनेगा आईसीडीएस। जिले की लगभग सभी बाल विकास परियोजना पदाधिकारी, डीपीओ, बीडीओ और प्रखंड़ प्रभारी पदाधिकारी सहित वरीय पदाधिकारी बेनागा इसी मुसहर टोला के किनारे से पटना जाते हैं। किसी ने कभी रूककर हाल जानना मुनासिब नहीं समझा, जबकि ये सरकार के दुलारे....कहे जाते हैं।

 

यकीन मानिए यह तस्वीर यूगांडा की नहीं अपने बिहार के भोजपुर कोइलवर की है