लाला का दुआर और बथानी टोला नरसंहार

                                       लाला का दुआर और बथानी टोला नरसंहार

आलेख:-भीम सिंह भवेश,ब्यूरो चीफ,राष्ट्रीय सहारा.भोजपुर 

‘‘ई लाला के दुआर हऽ। एहिजा सवा पहर सोना बरसत रहे। दुआर के जगला पर सारा गाँव जागत रहे, सुतला पर पूरा गांव सुत जात रहे। बथानी टोला, एकर रौनकता खा बइठल......... ।‘‘
शहर होते गाँव की युवा पीढ़ी भले ‘दुआर‘ के अस्तित्व से अपरिचित हो लेकिन दुआर-दलान का चहल-पहल बीसवीं सदी के अंतिम दशक तक के ग्रामीणों ने खूब महसूस किया है। गाँव में रहकर भोगा है उसकी जीवंतता को। वहाँ सुना है मर्दानगी बखान। निःशुल्क मिलते थे तीन पीढ़ियों का अनुभव, जिसमें सामाजिक बुराईयों के विरूद्ध उठ खड़ा होने का पोषण था। मर्यादाएं लाँघने पर बहिष्कार का अदृष्य भय और वर्जनाओं के लक्ष्मण रेखा की पहचान के नुस्खे। व्यक्ति और परिवार का वह दुआर, भूस्वामित्व के दायरे से आगे बढ़कर पूरे समाज को अपने में समाहित किए रहता था। अजीब दरियादिली से गाँवों का सम्मान बढ़ाता था दुआर। वहाँ रखे झलोर चरबधिया खटिया पर गमछे की घोघी में चूड़ा-चबेनी फाँकना और हर दो-चार फाँका के बाद चैकी पर रखे नमक में मिरचा बोर कर चटकारे के साथ चबेनी चबाने का मजा ही कुछ और होता था। गांव के गरीब-गुरबांे से जबरदस्ती, जान-माल की हेयारी और शादी-विवाह के बाद भवधी को भात नहीं देने की पंचायती भी इन्हीं दुआरों पर होते थे। बैठकी में मीलों दूर, किसी गांव की बरात में आने वाले नाच या शहर-देहात में घटित घटनाओं की सूचना सहजता से मिलती थी। होली में हित-दुश्मन सबके घर-घर जाकर गाये जाने वाले फगुआ ‘भउजी अँगनवा में मत घूमऽ जियरा भइले बेईमान..........के ताल भी यहीं से उठते थे। यहां न सिर्फ बतकही और तास के उछले पत्तों पर ठहाका गूंजतेे, बल्कि बढ़िया पगहा और खटिया बीनने वाले बिनवैया, बैलों को नाथने वाले नथवैया और अगुआ-पताई का चेहरा देखकर उसकी औकात आँकने वाले अनुभवी लोगों की विशेष इज्जत होती थी।
दुआर शब्द हिन्दी के द्वार शब्द का अपभ्रंश है। तब गांवों में सुखी-सम्पन्न लोगों का घर और दुआर अलग-अलग होते थे। घर में औरतें और दुआर पर मर्द रहते थे। दुआर की बनावट परिवार की सोच, समृद्धि और आवश्यकता पर निर्भर होता था। उसका नामकरण व्यक्ति वाचक, जाति वाचक, समूह वाचक और परिवार आधारित होने के साथ दो बैल, चार बैल और आठ बैल वाला दुआर के बतौर भी होता था। वहाँ की बैठकी में लोगों की उपस्थिति का तार, परिवार की सामाजिक प्रतिष्ठा से जुड़ा होता था। खैर!
भोजपुर के सहार प्रखंड के बड़की खड़ांव गाँव के मध्य अवस्थित यह ‘लाला का दुआर‘ भी वर्तमान गाँवों के अन्य दुआरों जैसा उदासी में डूब चुका है। इस अधटूटे ‘दुआर‘ पर गाड़ी से उतरने के बाद गाँवों की सभ्यता और संस्कृति का तेजी से क्षरण पर बहुत दुःख हुआ। जमीन पर बोरा बिछाकर सब्जी बेच रहे एक अधेड़ से उस व्यक्ति के घर का पता पूछा, जिसके यहाँ कायक्रम में शिरकत करने गया था। उसने हाथ और मँुह को संयुक्त रूप से क्रियाशील कर रास्ता बता दिया। मैं निर्निमेष भाव से उस दुआर को निहारना शुरू ही किया था, कि वहां खड़े बुजूूर्ग ने पूछा-
‘‘कहाँ घर है?‘‘
जवाब उन्हें दिया लेकिन निगाहें दुआर पर टिकी रहीं। गाँवों में आज भी बाहरी लोगों को देख अधेड़ और बुजुर्ग पूछ देते हैं, ‘‘कहाँ जाएके बा? कहाँ घर बा?....‘‘
लगे हाथ मैंने उनसे पूछा-‘‘ई केकर दुआर हऽ?‘‘
बातुनी किस्म के उस बुजुर्ग ने तपाक से कहा ‘‘ई लाला के दुआर हऽ। एहिजा सवा पहर सोना बरसत रहे। बथानी टोला नरसंहार, एह दुआर के रौनकता मिटा देलस।‘‘ लगा कि दुआर की उपेक्षा और जर्जरता पर ठहरी मेरी नजर को वे भाॅप गए थे।
‘‘बथानी टोला नरसंहार!‘‘ आवाज कान में पड़ते ही अचानक चैबीस साल पुरानी घटनाएँ स्मृतियों में कौंध गईं। भोजपुर जिले के इतिहास में सबसे बड़ा, नृशंस और दिनदहाड़े हुई इस नरसंहार ने अचानक बथानी टोला को देश स्तर पर सुर्खियों में ला दिया था। बथानीटोला पहुँचे तत्कालीन केन्द्रीय गृह मंत्री इन्द्रजीत गुप्त की टिप्पणी थी ‘‘यह घटना बेहद नृशंस और देश को शर्मसार करने वाली है।‘‘
11 जुलाई 1996 की बात है। शाम करीब चार बज रहे होंगे। जिला परिषद आरा के सभागार में एक बैठक चल रही थी, जिसमें तत्कालीन जिलाधिकारी डॉ गोरे लाल यादव भी थे। अचानक एक कर्मी जिलाधिकारी के टेबल पर झुककर उन्हें पूर्जा थमाया और कान में कुछ फुसफुसाया। तत्काल डाॅ यादव कुर्सी से उठ गए। ‘‘आप लोग मीटिंग कीजिए। मैं आ रहा हँू।‘‘ उन्होंने मिटिंग में शामिल लोगों से कहा। मीटिंग कुछ देर सामान्य रूप से चलकर समाप्त हो गई। डीएम के अचानक निकलने अथवा वायरलेस मैसेज पर कोई चर्चा नहीं हुई। पत्रकारों ने वहाँ से निकलने वाले पदाधिकारियों से टोह लेने का प्रयास किया लेकिन कुछ पता नहीं चल पाया। तब मोबाईल फोन नहीं थे। बेसिक फोन भी बमुश्किल से शहर के आठ से दस प्रतिशत परिवारों के पास थे। टेलीफोन कनेक्शन के लिए लगभग एक साल का वेटिंग चल रहा था। विशेष परिस्थिति में दस हजार रूपए सुरक्षित राशि अथवा सांसद की अनुशंसा पर फोन लगते थे। थानों के वायरलेश निर्धारित समय पर खुलते थे। कई थानों में वायरलेश भी काम नहीं कर रहे थे।
शाम करीब साढ़े सात बजे सूचना मिली कि सहार प्रखंड़ के बथानी टोला में रणवीर सेना ने 20-25 लोगों की हत्या कर दिया है। कुछ घायल सदर अस्पताल में आए हैं। हल्की बूंदाबांदी हो रही थीं। अस्पताल में दो घायल पहुंचे थे। माले कार्यकर्ता सहित कुछ अन्य लोग भी अस्पताल पहुंच गए थे। वहाँ की लाईट गूल थी। आपातकालीन कक्ष के बाहर एक पेट्रोमैक्स जल रहा था, जिसके प्रकाश में लोग खड़े होकर बातचीत कर रहे थे। बाद में पता चला कि वह पेट्रोमैक्स माले कार्यालय से लाया गया था। थोड़़ी ही देर बाद दोनों घायलों को पीएमसीएच रेफर कर दिया गया लेकिन अस्पताल में एम्बुलेंस नहीं था। माले कार्यकताओं के दबाव पर जिलाधिकारी द्वारा एक निजी एम्बुलेंस से दोनों घायलों को पीएमसीएच भिजावाया गया। मैं बेसिक फोन से रात के करीब नौ बजे अखबार में न्यूज लिखवाया। हालांकि अखबार के दफ्तर में राज्य मुख्यालय से खबर पहुँच चुकी थी।
सुबह करीब नौ बजे एक पत्रकार मित्र के साथ बथानी टोला के लिए राजदूत मोटरसाइकिल से निकला, जो आरा से करीब 40 किलोमीटर दूर था। आरा-एकौना-खैरा-सहार सिंगल सड़क काफी खराब थी। खैरा से बड़की खड़ांव तक नहर के किनारे कच्ची सड़क होने के कारण मोटरसायकिल जाने लायक नहीं थी। एक दिन पूर्व बारिश भी जबरदस्त हुई थी। लोगों ने बताया कि डीएम कल देर रात आरा से भाया चाॅदी, संदेश, अजीमाबाद होते खैरा पहुँचे थे। वहाँ से ट्रैक्टर पर चढ़कर बथानी टोला गए थे। हमलोग खैरा में ही मोटरसायकिल रखकर नहर के रास्ते पैदल चल दिए। एक तरफ नहर में पानी तो दूसरी ओर नहर के चाट में पानी था। खेतों की जुताई ट्रैक्टर और हल-बैल दोनों से हो रहे थे। तब बैलों से हल जोतने की परम्परा अंतिम सांसें ले रही थीं। हातिमगंज और धवरी गाँव पार करने के दरम्यान लोग अजीब निगाहों से बाहरी लोगों को देख रहे थे। रास्ता पूछने के लिए एक व्यक्ति को आवाज दिया कि ‘‘ऐ भाई जी सुनीए।‘ वह प्रश्न सुने बिना ही प्रतिप्रश्न करते हुए उत्तर सुना दिया। ‘‘बथानी टोला जाएके बा नु? सीधे चल जाईं।‘‘ हम लोग क्या पूछेंगे या क्या पूछना चाहते थे, इसकी परवाह किए बिना वह दूसरी ओर मूड़ गया। लगा कि कोई किसी से कुछ बात करने की स्थिति में नहीं है। बड़की खड़ांव गाँाव के पश्चिमी छोर से होकर हमलोग बथानी टोला पहँुचे। आरा से यहाँ पहुंचने में करीब तीन घंटे लग गये थे। यह टोला बड़की खडाॅव गाँव से महज तीन-चार सौ मीटर पश्चिम और उत्तर अवस्थित था।
बथानी टोला का नाम बथान शब्द से विस्तारित बताया गया। पशुओं के बाँधने वाले स्थान या गाँव से बाहर निकलकर बसे चंद परिवारों के वास स्थल को भोजपुरी में बथान कहा जाता है। परिवारों की बढ़ती संख्या के बाद जानवरों का यह बथान, बरास्ते जाति वाचक संज्ञा, व्यक्ति वाचक यों कहिए स्थान वाचक संज्ञा में परिणत होकर ‘‘बथानी टोला‘‘ हो गया। यहाँ के नरसंहार ने एक छोटे बथान को देश स्तर पर चर्चा में ला दिया था। बथानी टोला के एक तरफ नहर और दूसरी ओर टीलानुमा सरकारी स्थल था, जिसका उपयोग जानवरों को बाँधने या बच्चों के खेलने में हो रहा था।
घटना स्थल के समीप का दृष्य हृदय विदारक था। गोलीबारी के वक्त भागकर या छिपकर जान बचाने वाले सौभग्यशाली लोगों के चेहरे भयाक्रांत थे। बताया गया कि थोड़ी देर पहले बच्चे, बूढ़े और महिलाओं के उन्नीस शव ट्रैक्टर से खैरा होते हुए आरा सदर अस्पताल भेजे गए हैं। रात करीब डेढ़ बजे ट्रैक्टर से डीएम डाॅ गोरेलाल यादव और एसपी एसएन प्रधान काफी संख्या में पुलिस बल के साथ आये थे। बड़की खड़ाॅव प्राथमिक विद्यालय, छोटकी खड़ाॅव मठिया और पतलपुरा में तीन जगह पुलिस पीकेट थी लेकिन सैकड़ों राउंड गोलियाँ चलने के बावजूद पुलिस घटना स्थल की ओर नहीं आईं। प्रभावितों ने आरोप लगाया ‘‘पुलिस की मिलीभगत से यह सुनियोजित हमला हुआ है। यहाँ नईम मिया के परिवार की तीन माह की दूधमुंही बच्ची समेत पाँच लोगों को मारा गया है। बाकी लोगों को इघर-उधर घेर कर मारा गया गया था। नईम का घायल बेटा सदाम हुसैन और राधिका देवी इलाज के लिए आरा गईं हैं।‘‘ लोगों ने पुआल का एक टाल दिखाया, जिसके चारो ओर गोलाई में खून के धब्बे दिख रहे थे। उन्होंने बताया ‘‘पिछले 3 दिनों से गोलीबारी हो रही थी। कल भी दोपहर से गोलीबारी शुरू हुई लेकिन रणवीर सेना की तैयारी की सूचना नहीं थी। वे काफी संख्या में हरवे-हथियार से लैश थे। अचानक गांव की ओर से रणवीर सेना के दस्ते ने फायर झोंक दिया, जिससे माले की ओर से प्रतिवाद कर रहे लोगों को भागना पड़ा। इधर के लोगों के पाँव उखड़तेे देख रणवीर सेना के दस्ते ने बथानी टोला पर धावा बोल दिया। टोला के अधिकांश पुरुष भाग निकले लेकिन महिला, बच्चे और बुजुर्ग रह गए। कुछ लोग इधर-उधर भागकर छिपने का प्रयास भी किए लेकिन यहाँ घरों की संख्या कम थी। बाहर परती खेत और आहर-पईन में पानी भरने के कारण छुपने की कहीं जगह भी नहीं थी। जब बथानीटोला पर नृशंस हत्याओं का दौर शुरू हुआ तो शायद प्रकृति से भी रहा नहीं गया। इतनी तेज बारिश हुई कि हमलावर अपने हथियार बचाने और कपकपी से बचने के लिए तितर-बितर होने लगे थे। अन्यथा लाशों की संख्या और बढ़ती।‘‘
टोला के मारवाड़ी चैधरी के घर में कुल 14 लोगों की रणवीर सेना के दस्ते ने निर्दयता से हत्या कर दिया था। इनमें नईम के तीन माह के बच्चे को उछाल कर काट दिया गया था। उनकी विधवा बहन जैदुनिसा अपनी गोद में नईम के 5 साल के अमीर सुभानी (जिसका नाम 90 बैच के टॉपर आईएएस और भोजपुर के डीडीसी बाद में डीएम और वर्तमान में बिहार के गृह आयुक्त आमिर सुबहानि के नाम पर रखा गया था) छुपायी थी। हमलावरों की एक बुलेट ने दोनों फुआ-भतीजा को एक साथ मौत की नींद सुला दी। हमलावर अस्त्र-शस्त्र से लैश थे। सेमी रायफल से लेकर लाठी-भाला तक। इस हमले में रणबीर सेना के सशस्त्र दस्ता के साथ गाँव की तीन पीढ़ियाँ थीं, जिनकी आॅखों में धधकते शोले ने नृशंसता की सारी हदें पार कर दीं थीं। इस नरसंहार में कुल 21 लोग मारे गये थे।
बथानी टोला से हमलोग बड़की खड़ाॅव गाँव होकर लौटने लगे। पूरा गांव मर्दों से खाली हो गया था। औरतें चैकन्ना थीं। कुछ छतों के ऊपर तो कुछ गलियों में खड़ी होकर आने-जाने वालों को घूर रही थीं। पारचुन की दुकान से बिस्कुट खरीदने के दरमियान एक वृद्ध पुरूष और कुछ महिलाओं से औपचारिक बातें शुरू हुईं। उनके जख्मों को कुरेदने पर बोलने लगीं। ‘‘मुखिया और संता सिंह की हत्या करके माले ने इस विवाद को खड़ा किया है। तीन दिनों से बथानी टोला में दस्ता आया था। वे लोग गांव से बाहर शौच के लिए जाने वाली महिलाओं को देखकर फायर करते थे। गाँव के दामाद की हत्या कर दीं। हम लोगों की तो कोई सुनता नहीं है। सब लोग माले, माले.........। अजीज कर दिए नसलाईट लोग।‘‘ एक अधेड़ महिला ने कहा-‘‘कौन अपने बेटा-भतार को लड़ाई में झोंकवाना चाहती है लेकिन जान और इज्जत नहीं रहेगी तो जी कर क्या होगा?‘‘ लगा था कि इतनी बड़ी और नृशंस घटना का उन्हे पश्चाताप नहीं है। वे प्रतिहिंसा की ज्वाला में झुलसना और झुलसाना मजबूरी बता रही थीं। यह वह दौर था जब सामान्य आदमी भी अपने को किसी अपरिचित माले और रणवीर सेना समर्थक से उसका सहयोगी बताकर उसकी भावनाओं को काफी हद तक पढ़ सकता था। ऊपरी तौर पर जानकारी हासिल कर सकता था। उसके भीतर विरोध के हथियार को आसानी से धार दे सकता था। दक्षिणी इलाके में कई गाँवों के किसानों के खेत परती थे। एक ही गाँव के साथ बढ़े-पले लोग भी माले और रणवीर सेना समर्थकों के बीच बॅट गये थे। ये एक दूसरे को शक की निगाहों से देखते थे। दोनों पक्ष के समर्थकों के यहाँ बाहरी दस्ते के लोग आते-जाते रहते थे। जिले के दक्षिणी इलाके में अपवाद स्वरूप ही कुछ जातियाॅ तटस्थ थीं, जबकि जाने-अनजाने शेष जातियों को माले अथवा रणवीर समर्थक और शुभचिंतक करार दे ही दिया गया था। अमूमन सवर्ण जातियों को रणवीर सेना और निम्न एवं कुछ पिछड़ी जातियों को माले समर्थक बताया जा रहा था। समर्थकों में कुछ कार्यकर्ता और नेता अपवाद भी थे। भाकपा(माले) के महासचिव का.विनोद मिश्र सहित अनेक अपवाद थे। लगातार घट रही हिंसक घटनाओं के बावजूद सरकार का ध्यान क्षेत्र का विकास एवं आधारभूत संरचनाओं के विस्तार के प्रति उदासीन था। हर घटना के बाद वरीय पदाधिकारी और नेता आते लेकिन क्षेत्र को यथास्थिति में छोड़ लौट जाते। जिले में बिजली और सड़क की स्थिति काफी बदतर थी। तब बिहार में जनता दल के मुख्यमंत्री लालू प्रसाद तथा आरा सेें इसी दल के सांसद चन्द्रदेव प्रसाद वर्मा थे। पटना जिला का मनेर एवं पालीगंज विधानसभा आरा लोकसभा क्षेत्र से जुड़ा हुआ था। रणवीर सेना के संचालन ब्रह्मेश्वर मुखिया फरार चल रहे थे।
क्रमशः जारी...................
 कल दूसरा और अंतिम क़िस्त........
 

लाला का दुआर और बथानी टोला नरसंहार