आपातकाल, जमदग्नि ऋषि और ढेढुआ पम्प भोजपुर को कब मिलेंगे ओम प्रकाश ?

आपातकाल, जमदग्नि ऋषि और ढेढुआ पम्प भोजपुर को कब मिलेंगे ओम प्रकाश ?


यात्रा वृतांत आलेख:-डाक्टर भीम सिंह भवेश,ब्यूरो चीफ राष्ट्रीय सहारा,भोजपुर 
25 जून 1975 को लगे आपातकाल ने आजादी के बाद देश में बड़े आंदोलन की नींव रख दिया था। इसके कोख से देश के हर हिस्से में युवा नेताओं का समूह पैदा हुआ, जिन्हे संपूर्ण क्रांति की देन कहा जाता है। उस समय का राजनीतिक माहौल और कानुन-व्यवस्था का विश्लेषण कई दृष्टिकोण से किए जाते हैं। प्रजातंत्र का काला अध्याय के उस दौर की खामियों में से कुछ खूबियां निकालने वाले लोग भी हैं। वे यह कहते नहीं थकते कि ‘‘आपातकाल में ट्रेनों के आगमन और प्रस्थान से लोग अपनी घड़ी मिलाते थे।‘‘ वैश्विक स्तर पर कोविड-19 के कारण भारत के लिए पुनः एक दौर आया, जब ट्रेन नियत समय और कई बार स्टेशन पर बिफोर पहुंचने लगीं। लाॅकडाउन प्रथम के करीब 7 माह बाद मैं आरा रेलवे स्टेशन से फरक्का एक्सप्रेस पकड़ा था। रास्ते में ससमय चलती रही। लेकिन दिलदारनगर स्टेशन पर बिफोर पहुंच गई। पहले से ही ट्रेन में आरूढ़ एक यात्री ने अपनी घड़ी देखकर कहा ‘‘इन दिनों आपातकाल की तरह ट्रेनें चल रही हैं।‘‘ उस बुजुर्ग का चेहरा पढ़ने का मैंने बहुत प्रयास किया ताकि आपातकाल की खूबियों और खामियों का संपूर्ण झलक मिल जाए लेकिन ऐसा हो नहीं सका। आग्रह और पूर्वाग्रह रहित उनके बाॅडी लैंग्वेज पर गुलाबी ठंड से उपजी हल्की सिहरन ने एक नया आवरण चढ़ा दिया। वहाँ से नियत समय पर ट्रेन खुली। अगले स्टेशन पर उस बुजूर्ग का साथ छूट गया, जिन्होंने आपातकाल की तरह लाॅकडाउन में समय से ट्रेन चलने की बातें की थीं।
स्टेशन पर करीब आठ-दस लोग उतरे होंगे। लंबे प्लेटफार्म से गुजरते हुए पूर्वी गुमटी तक पहुंचन के क्रम में माॅर्निंग वाक का एहसास हो गया। अचानक स्टेशन पर कई जगह अंकित ‘जमानिया‘ शब्द मस्तिष्क से टकराया। पूर्वी छोर पर मित्र जय शंकर तिवारी के पुत्र अभिजीत तिवारी आगवानी कर रहे थे। श्री तिवारी जमानिया में ही ग्रामीण बैंक में हैं। उन्हीं के साथ वाराणसी जिला के गोपालपुर में चल रहे पूज्य गुरू श्री जीयर स्वामी जी के चातुर्मास्य यज्ञ में जाना था। उनके अभिवादन के साथ ही मैंने कहा ‘‘पहली बार जमानिया स्टेशन पर उतरा हूॅ। अजीब नाम है जमानिया।‘‘ उन्होंने तत्काल प्रत्युत्तर दिया। ‘‘जमदग्नि ऋषि के नाम पर है जमानिया।‘‘
जमानिया का इतिहास, भूगोल और समाजशास्त्र पर गौर करना शुरू किया। जमानिया गाजीपुर जिला का एक छोटा कस्बाई शहर है। नगर पंचायत की परिधि में आ चुका है। आबादी करीब चालीस हजार है। महर्षि जमदग्नि ऋषि के नाम पर बसे इस शहर का नाम पूर्व में जमदग्नि दामिनी पूरी था। मुगलकालीन शासकों ने इसका नामकरण जमानिया कर दिया। यह उत्तरवाहिनी गंगा तट पर अवस्थित है, जिसे काफी पवित्र स्थल माना जाता है। यहां यूपी-बिहार को मिलाने वाली पतित पावनी गंगा और रेल मार्ग ही नहीं बल्किजमानिया-दिलदारनगर सड़क से लेकर बोलचाल की भाषा और बेटी-रोटी का संबंध भी है। जमदग्नि ऋषि, ऋचीक ऋषि के पुत्र और महर्षि भृगु के पौत्र थे, जिनकी गणना सप्त ऋषियों में होती है। इनके पाॅचवें पुत्र परशुराम थे। परशुराम को कुछ लोग क्षत्रिय विरोधी बताते हैं। जबकि महर्षि परशुराम क्षत्रिय विरोधी नहीं, अपितु अपने पिता की हत्या करने वाले हैहयवंश के विरोधी थे। ततकालीन प्रतापी राजा दशरथ और विदेह राजा जनक आदि क्षत्रिय राजाओं से उनकी मित्रता थी। खैर....
वाहन द्वारा जमानिया से अभी बमुश्किल एक किमी आगे बढ़ें होंगे कि पक्की नहर के सामानांतर कालीकरण वाली सड़क मिली। नहर के बेस की चैड़ाई करीब 20 फीट होगी। नीचले हिस्से से बांध तक ईंट सोलिंग युक्त स्लोप था। नहर में पानी नहीं था। शायद धान कटनी का मौसम के कारण जलापूर्ति बंद था। कुछ दूर आगे बढ़ने पर सड़क की बाईं और तीन मंजिला बहू इमारत समूह में दिखाई दिए। प्रतीत हुआ कि शहरी गरीब/झोपड़पट्टी के लोगों का सरकार द्वारा निवास स्थल बनाया गया होगा। नजदीक जाकर पता किया तो अनुमान सही निकला। लंबे अरसे से भोजपुर एवं बक्सर जिले में बिहार के सर्वाधिक गरीब मुसहर जाति के विकास हेतु प्रयासरत रहने के कारण नहर की दूसरी ओर निगाह गईं। भान हुआ कि सभी परिवार मुसहर जाति के हैं। पास गए तो वे लोग बताएं कि हम लोग मुसहर जाति के हैं। उत्तर प्रदेश में मुसहर बनवासी बोले जाते हैं। एक-दो लोगों से नाम पूछा तो अपना टाईटल बनवासी बताए। उनके चेहरे और बोली भी काफी हद तक बिहार की मुसहर जाति से मेल खा रही थी। लेकिन साफ-सफाई में उनकी स्थिति बिहार के मुसहरों से बेहतर लगी। उन्होंने बताया कि सामने वाले अपार्टमेंट में उनका आवास नहीं है। कई वर्षों से आहर के किनारे ही रहते हैं। उनके अधिकांश बच्चे भी बिहार की मुसहर जाति के बच्चों की तरह स्कूल नहीं जाते हैं। समयाभाव के कारण उनके आर्थिक और सामाजिक जीवन की गहराइयों में नहीं उतर पाया। खैर...
वहां से महज दो सौ मीटर आगे बढ़कर ज्योंही दाहिनी ओर मुड़ा कि गंगा नदी से जुड़े लिफ्ट एरिगेशन का संयंत्र दिखाई दिया। यानी इस नहर का उद्भव स्थल या जलश्रोत। मन में मानव निर्मित इस उदवह सिंचाई योजना को देखने की जिज्ञासा हुई। भतीजा अभिजीत तिवारी ने भी देखने का आग्रह किया। वाहन से उतरकर नहर पर चलने लगा तो अचानक भारत में पहली बार शाहबाद में बने सोन नहर की याद ताजा हो गई। 1857 में वीर कुंवर सिंह द्वारा ब्रिटिश सलतनत से बगावत में आसपास के लोगों का भरपूर साथ देने से अंग्रेज बौखला गए थे। उन्होंने क्षेत्र के लोगों का ध्यान विद्रोह और वीर कुंवर सिंह सरीखे सेनानायक से भटकाने के उद्देश्य से पहली बार अपनी नीति ‘‘डिवाइड एंड रूल‘‘ में विस्तार करते हुए ‘‘डायवर्ट एंड रूल‘‘ का फार्मूला अपनाया। अंग्रेजों ने लाल सागर और भूमध्यसागर को जोड़ने वाली 168 किमी लम्बी स्वेज नहर का अनुकरण कर 1873-74 में आरा सोन नहर (101 किमी) का निमार्ण शुरू कराया था। इसमें सिंचाई के साथ जलमार्ग की भी व्यवस्था थी। गंगा नदी भाया गांगी बघौत लॉक से अकोढ़ीगोला तक 13 लाॅक के सहारे स्टीम इंजन वाली वोट और नावें चलती थीं। नहर के निर्माण से शाहाबाद का बड़ा हिस्सा आबाद हो गया लेकिन करीब डेढ़ सौ साल पुरानी यह कच्ची नहर अपनी क्षमता से बहुत कम सिंचाई कर पाती है। पानी बर्बाद होता है। नहरों के टेल सहित कई रजवाहों में पानी नहीं पहुँचता है। इसकी पक्कीकरण की चर्चा यों तो दशकों से चल रही है लेकिन पिछले 6 सालों से आरा सांसद सह केंद्रीय मंत्री आरके सिंह का 'आरा नहर का पक्कीकरण स्वर्णिम प्लान है'। इसे अमलीजामा पहनते देखने के लिए भोजपुर की जनता वर्षों से बेताब है।
पम्प नहर के नजदीक पहुंचने पर देखा कि इसके भवन पर ‘‘चैधरी चरण सिंह जमानिया पम्प गृह, जनपद गाजीपुर‘‘ लिखा है। आठ पम्प गंगा नदी से लगे हुए थे। सिचाई क्षमता 41,725 हेक्टेयर (70,000 एकड़) है। एक अधेड़ राम बली ने बताया कि क्षेत्र के पूर्व सांसद ओम प्रकाश सिंह द्वारा पंप नहर में मोटर एवं पम्प बदलने के लिए काफी प्रयास किए गए हैं। गाजीपुर के पूर्व सांसद और यूपी के पूर्व मंत्री ओमप्रकाश सिंह! नाम सुनते ही मस्तिष्क में 33 साल पुरानी घटना ताजा हो गईं।
वर्ष1987 के वसंतपंचमी का दिन था। बीएचयू के छात्र परम्परानुसार शोभा जुलूस निकाले थे। तत्कालीन वीसी आर.पी. रस्तोगी ने रूट डायवर्ट करा दिया लेकिन छात्र अड़ गए। पुलिस ने लाठियां बरसानी शुरू कर दिया। बीएचयू छात्र संघ के तत्कालीन महासचिव ओम प्रकाश सिंह पुलिस और छात्रों के बीच दिवार बन गए। पुलिस श्री सिंह पर टूट पड़ी। अगले दिन पूरा उत्तर प्रदेश छात्र आंदोलन की आग में धधक उठा था। अस्पताल में भर्ती श्री सिंह को देखने चंद्रशेखर सहित कई दिग्गज पहुंचे थे। इसी घटना ने श्री सिंह के जीवन में बदलाव की नींव रख दिया। वाद में वे आधा दर्जन से अधिक बार सांसद, विधायक और मंत्री रहे।
इंदिरा जी की हत्या (31 अक्टूबर 1984) के बाद परीक्षा की तिथि में लगातार विस्तार के कारण विवि का शैक्षणिक सत्र विलंब से चल रहा था। मैं जैन कॉलेज आरा के अर्थशास्त्र प्रतिष्ठा का छात्र के बतौर परीक्षाफल का इंतजार कर रहा था। वसंत पंचमी के कारीब एक सप्ताह बाद वाराणसी गया था। तब बीएचयू में पीएच-डी. कर रहे रिश्तेदार कुंदन कुमार सिंह ( पूर्व डीन वीर कुंवर सिंह विश्वविद्यालय, आरा) के साथ राजा राम मोहन राय हाॅस्टल में रूका। अगले दिन उनके साथ ओम प्रकाश सिंह को देखने अस्पताल गया। पहली बार बीएचयू कैंपस में जाने के बाद बड़ी हैरानी हुई थी, क्योकि आरा के कॉलेजों के अतिरिक्त किसी बड़े शैक्षणिक संस्थान में नहीं गया था। तब सपही गाॅव (बक्सर जिला) के नवल राय अपनी एचडी मोटर सायकिल से बीएचयू घूमाए थे।
जमानिया के उस पंप नहर पर खड़े होकर ओम प्रकाश सिंह का मोबाइल नंबर ढुंढना शुरू किया लेकिन डिलीट हो गया था। तब डाॅ कुंदन सिंह को फोन कर ओम प्रकाश सिंह का नंबर मिलाया। यूपी के पूर्व मंत्री ओम प्रकाश सिंह ने बताया ‘‘1993 में चार पम्प लगवाकर इसकी क्षमता 1050 क्यूसेक कराया था। तब मोटर 600 घंटे से 1000 घंटे चलने लगीं। पुनः दो मोटर और 8 पम्प आए हैं। 6 पम्प आने वाले हैं। उन्होंने कहा कि अपने क्षेत्र के गहमर आदि जगहों पर 30-30 क्यूसेक क्षमता का 8 लघु लिफ्ट पम्प लगवायें हैं। उनके गांव सेवराई का हाल पूछा तो उन्होंने कहा कि वहां 4 राजकीय और 25 निजी ट्यूबेल लगवाये हैं। गांव को तहसील बनवाने के साथ वहां सौ बेड का अस्पताल बनवा दिया। श्री सिंह ने कहा कि यूपी में नहर से सिंचाई के 'लगान' नहीं लगते। सपा ने किसानों को निःशुल्क सिंचाई की व्यवस्था किया है। मैंने धन्यवाद दिया तो उन्होंने गांव आने का आमंत्रण देते हुए कहा कि आपको यूपी का ही मानता हूं। आते रहिए। (मेरे पूर्वज यूपी के इटावा-मैनपुरी से बिहार आए थे, इसकी जानकारी उन्हें पूर्व से थी।) मन ही मन श्री सिंह के ‘जनप्रतिनिधि दायित्व‘ के प्रति आभार जताया और दिल से आवाज निकली "काश, भोजपुर को भी एक ओम प्रकाश मिले होते!
श्री सिंह द्वारा क्षेत्र में 8 लिफ्ट सिंचाई योजना का नाम सुनते ही भोजपुर जिले के संदेश प्रखंड के ढेढुआ पंप नहर का शिलापट्ट मानो नजरों के सामने दिख गया। इस पम्प नहर की आधारशिला 1990 में मुख्यमंत्री लालू प्रसाद ने रखा था। उस वक्त बोले थे "एकरा पानी से जेठ में बेंग बोली।" लेकिन आज 30 साल बाद भी निर्माण कार्य की शुरुआत नहीं हो पाया। जमानिया पंप नहर का मूर्त रूप के सामने ढेढुआ पम्प नहर का निर्माण और आरा कैनाल का पक्कीकरण के बाद की तस्वीर जेहन में लाने का प्रयास करते हुए चातुर्मास्य यज्ञ के लिए चल पड़ा। मन ही मन ईश्वर से प्रार्थना किया कि भोजपुर के किसानों की संवृद्धि के निमित ये दोनों योजनाएं मेरे दिवास्वप्न बनकर न रह जाएं!

 

आपातकाल, जमदग्नि ऋषि और ढेढुआ पम्प भोजपुर को कब मिलेंगे ओम प्रकाश ?