सरकार में व्याप्त भ्रष्टाचार & अराजकता एवं नौकरशाहों की भेंट चढ़ा सूचना का अधिकार अधिनियम 2005

सरकार में व्याप्त भ्रष्टाचार & अराजकता एवं नौकरशाहों की भेंट चढ़ा सूचना का अधिकार अधिनियम 2005


 
 भारत के संविधान ने लोकतंत्रात्मक गणराज्य की स्थापना की है , और लोकतंत्र शिक्षित नागरिक वर्ग तथा ऐसी सूचना की पारदर्शिता की उपेक्षा करता है , जो उसके कार्यकरण तथा भ्रष्टाचार को रोकने के लिए भी और सरकारों तथा उनके परिकरणों को शासन के प्रति उत्तरदायी बनाने के लिए अनिवार्य है । इसी उद्देश्य की प्राप्ति हेतू भारतीय सांसदों ने सरकार में सुशासन जिसमें पारदर्शिता , संवेदनशीलता , सहभागिता , जवाबदेही , जिम्मेदारी एवं जागरूकता सम्मिलित है कि स्थापना के उद्देश्य से सूचना का अधिकार अधिनियम 2005 बनाया जिस पर महामहिम राष्ट्रपति जी ने 15 जुन 2005 को अधिनियम पर हस्ताक्षर कर निर्मित अधिनियम की स्वीकृति प्रदान  कर दिए और यह 21 जुन 2005 को भारत के राजपत्र में प्रकाशित हुआ, जो 12 अक्टूबर 2005 से प्रभावशील हुआ । सुचना का अधिकार अधिनियम के धारा 4 ( 1 ) ( ख ) में मंत्रालय व विभाग व संगठन की विशिष्टियाँ , कृत्य , कर्तव्य , कर्मचारियों की नाम , पद , शक्तियाँ , कर्त्तव्य... इत्यादि की 17 बिन्दुओं की जानकारी एकत्रित कर रखने का अधिनियमित किया गया । तथा यह कार्य अधिनियम के अधिनियमन से एक सौ बीस ( 120 ) दिन के भीतर पूर्ण करने का समय तय किया । अधिनियम 2005 की धारा 4 ( 2 ) में स्पष्ट किया गया कि प्रत्येक लोक पदाधिकारी का निरंतर प्रयास होगा कि वह उपधारा 4 ( 1 ) के खण्ड ( ख ) की अपेक्षाओं के अनुसार स्वप्रेरण से जनता को नियमित अन्तरालों पर संसूचना के विभिन्न साधनों के माध्यम से , इतनी अधिक सूचना उपलब्ध कराने के लिए उपाय करे जिससे कि जनता को सूचना प्राप्त करने के लिए कोई कठिनाई उत्पन्न न हो । लेकिन दुःख की बात है कि लगभग 16 ( सोलह ) वर्ष पूर्ण हो गए लेकिन R.T.I Act 2005 की धारा 4 ( 1 ) ( ख ) में अधिनियमित तथ्यें कहीं देखने को नहीं मिलता है । यह सरकार में व्याप्त अराजकता , भ्रष्टाचार एवं नौकरशाहों की शायद भेंट चढ़ गई । दुःख की बात यह भी है कि कई राज्यों के आयोगों में सुनवाई करने वाले पदा० का पद भी पूर्ण रूप से भरा नहीं जा सका है । बिहार की स्थितियाँ तो अत्यंत चिन्ताजनक बन गई है । बिहार में आनन फानन में सूचना की प्राप्ति हेतू एवं मार्गदर्शन के लिए कॉल सेन्टर की स्थापना हुई जिसका नं०-155311 & 155310 है , यह भी लगभग ध्वस्त हो चुका है । दु:खद तथ्य यह भी है कि बिहार के आयोग में कई पद रिक्त पड़े हुए है , तथा बेवसाईट भी बन्द पड़ा हुआ है । राज्य सरकारों के विभिन्न महकमों में RTI कानून के तहत आनेवाले आवेदनों को अफसरों द्वारा मजे की अनदेखी की जा रही है । रोचक तथ्य यह कि अधिकारी लगभग 40 % अन्य कारणों के चलते तकनीकि आधार पर एवं लगभग 20% निजता के उल्लंघन के नाम पर सूचना देने से ही इनकार कर दे रहें है । संविधान के अनुच्छेद 239 के अधिन नियुक्त प्रशासक अर्थात् अफसरों द्वारा सूचना को इग्नोर किए जाने पर राज्य सूचना आयोग भी कोई सार्थक कार्रवाई नहीं कर पा रही है । जो सूचना प्रत्येक स्टेप मिलाकर 90 ( नब्बे ) दिनों के अन्दर हर हाल में मिल जाना चाहिए , वह सूचना आज मिलने में साल बित जाते हैं । कईयों आवाज उठाने वाले RTI कार्यकर्ता की हत्याएं हो गई । जो बचे हुए हैं , उन्हें भी भ्रष्टाचार मामलें में सूचना मांगने पर जबदस्त प्रताड़ित किया जाने लगा है । जो चिन्ता का विषय है ।
 सरकार से मांग
1 सूचना अधिकार अधिनियन की धारा 4 ( 1 ) ( ख ) पूर्ण रूप से लागू कर धरातल पर उतारें तथा धारा 4 ( 1 ),4(2 ),4(3 ),4(4 ) का अनुपालन सुनिश्चित हो । 
2 . R.T.I कार्यकर्ताओं या आवेदन कर्ताओं को प्रताड़ना बन्द हो , तथा प्रताड़ित करने वाले पदा० के विरूद्ध सख्त दण्ड का प्रावधान सुनिश्चित हो । 3 . आयोगों में R.T.I की धारा - 19 ( 8 - B ) , 20 ( 1 ) , 20 ( 2 ) के तहत् दण्डादेश का अनुपालन सुनिश्चित हो । 
4 . सूचना आयोगों में रिक्त पड़े सारे पद तुरंत के प्रभाव से भरना सुनिश्चित हो । 
5 . R.T.I Act - 2005 के अधिनियम के तहत् निर्धारित समय अवधि अन्तर्गत हर हाल में आवेदकों को सूचना मुहैया कराना सुनिश्चित हो । प्रार्थना 
सभी सम्पदकों , संचालकों से नम्र विनति है कि इसे जनहित में प्रकाशित व प्रसारित करने की कृपा करना चाहेंगे।
                             साभार!
                              भवदीय
                  ई०बिरेन्द्र कुमार सिंह।
राष्ट्रीय आर०टी०आई०&ह्यूमन एवं समाजिक कार्यकर्त्ता।
                                 सह
                            संयुक्त सचिव
                 बिहार सूचना का अधिकार मंच।
                  मुरादपुर,पटना,बिहार-800004.

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