दो में से तुम्हें क्या चाहिए मौत या जिंदगी -बिहार सरकार

दो में से तुम्हें क्या चाहिए मौत या जिंदगी -बिहार सरकार


आलेख :-धीरेन्द्र कुमार 
                 बिहार में 40 की उम्र पार कर चुके अनुसूचित जाति जनजाति के लोगों पर जान का खतरा बढ़ गया है। बिहार के इन दोनों वर्ग के बुजुर्ग पिछले 72 घंटा से अपने ही घर के नौजवानों से भयभीत हैं। जो नौजवान उनके लिए बुढ़ापे का सहारा था/बुढ़ापे के लिए लाठी था वही नौजवान आज अगर उनके सामने लाठी लिए खड़ा है तो बुजुर्ग को यमराज नजर आ रहा है। संभव है कि आने वाले दिनो में बिहार के अनुसूचित जाति-जनजाति जमात के बुजुर्गों की ओर से सुरक्षा की मांग की जाए।
               रिश्तों का ताना बाना सामाजिक शक्ति को मजबूत करने के लिए गढ़ा गया होगा। रिश्ते एक दूसरे का हौसला बढ़ाने के लिए होते हैं, रिश्ते बुरे वक्त में एक दूसरे के साथ खड़ा होने के लिए होते हैं। लेकिन, अगर रिश्तों में वोट की राजनीति सेंधमारी करने पर उतारु हो जाए तो सामने खड़ा श्रवण कुमार भी पिता के लिए राजा दशरथ की भांती यमराज दिखता है।
            दरअसल बिहार के अनुसूचित जाति-जनजाति के बुजुर्गों के बीच भय के पीछे नीतीश कुमार की राजनीति है। आसन्न चुनाव के मद्देनजर दलित वोट को अपने पक्ष में करने को आतुर नीतीश कुमार ने 04 सितंबर को एक अभूतपूर्व फैसला लिया। फैसले के अनुसार बिहार में रहने वाले किसी भी अनुसूचित जाति-जनजाति के लोगों की अगर हत्या होती है तो, मृतक के परिजन को सरकारी नौकरी मिलेगी। इस अदूरदर्शी फैसले के बाद बिहार में अनुसूचित जाति-जनजाति सामाज का ताना बाना विखंडित हो सकता है। उम्र पा चुका पिता अब अपने ही बच्चों से कैसे बचे, इस रणनीति पर विचार कर रहा है।
             दरअसल हर सरकार अपने कार्यकाल में चाहती है कि वो एक ऐसा नैरेटिव सेट करे जिसके आधार पर आने वाला कालखंड उसे याद करता रहे। कई बार नैरेटिव जनता भी सेट करती है। अगर बिहार का ही उदाहरण लें तो लालू प्रसाद के शासन काल के लिए अराजक/दृष्टिहीन सरकार/दिशाहीन सरकार का नैरेटिव सेट है। हालांकि इस नैरेटिव को सरकार ने नहीं जनता ने सेट किया था। ये अलग बात है कि तत्कालीन राज्य सरकार ने अपने लिए कोई खास नैरेटिव सेट करना उचित नहीं समझती थी। फिर भी, सिक्के के दूसरे पहलू के अनुसार लालू प्रसाद यादव की सरकार को गूंगे के लिए आवाज की सरकार के तौर पर स्वीकार किया जाता रहा है। लालू प्रसाद और उनकी पार्टी अपने कार्यकाल को सामाजिक न्याय की सरकार के तौर पर पेश करते हैं, हालांकि अन्याय के छावं तले ही न्याय पनप रहा था।
             नीतीश कुमार ने भी अपनी सरकार के लिए सुशासन का नैरेटिव सेट किया था। कमोबेस इस नैरेटिव की स्वीकार्यता जनता के बीच हो चली थी। लेकिन, 2020 की संध्या पर शायद सुशासन के मसिहा को अपने ही नारों पर भरोसा नहीं रहा।
            अगर 15 साल शासन करने के बाद भी सरकार को पिछड़ा दलित और अगड़ा शब्द का इस्तेमाल चुनाव जीतने के लिए करना पड़ रहा हो तो यकीन मानिए सरकार को अपनी नीतियों/उपलब्धियों पर भरोसा नहीं है। सरकारें सिर्फ काम करने के लिए चुनी जाती हैं ये अर्धसत्य है। पूर्णसत्य है कि सरकारें जनता के बीच काम का भरोसा पैदा करने के लिए चुनी जाती हैं। विकास एक सतत प्रक्रिया है, अगर मार्ग में कोई बाधा नहीं हो तो अबोध बच्चा भी एक पैर उठाने के बाद दूसरा पैर आगे बढ़ने के लिए ही उठाता है। सरकारों की जिम्मेदारी है कि मार्ग के अवरोध को दूर करे।

15 साल के कार्यकाल के बाद नीतीश सरकार को बताना चाहिए था कि, उनकी सरकार मानव जाति के विकास के लिए किन अवरोधों को दूर करने में कामयाब रही और क्या बाकी रह गया?अफसोस कि आप विकास के लिए अवरोध दूर करना तो दूर अब आप अवरोध को ही विकास का पैमाना बनाने पर तुले हैं।
            आपसे उम्मीद थी कि आप बताएंगे कि मानव जीवन कैसा हो, कैसे इसे सार्थक बनाया जाए और जीवन को सार्थक करने में सरकार कैसे आम लोगों की मदद करेगी। लेकिन आप तो मृत्यु में संजीविनी बताने लगे।
            बिहार में 30 सालों से अलग अलग चेहरे के साथ सामाजिक न्याय की सरकार है। संविधान 26 जनवरी 1950 से ही सामाजिक न्याय के नाम पर जात-पात को खत्म करते हुए कुछेक जाति को सबल और कुछेक को निर्बल करने का अधिकार सरकार को सौंपे हुए है। सातवीं पंचवर्षिय योजना ही समाजिक न्याय के नाम समर्पित थी। इसके बाबजूद अगर सरकार खुल्लम खुल्ला मौत पर मुनाफा बांटने का साहस दिखा रही है तो, यकीनन यह 72-73 साल के राजनीतिक सफर के दीवालिया होने का ऐलान है। यह इस बात का ऐलान है कि सरकार अब लेन देन की नीति पर उतारू है, तुम मौत मांगों हम नौकरी देंगे।

 

दो में से तुम्हें क्या चाहिए मौत या जिंदगी -बिहार सरकार