न्याय चाहिए तो जमात बनाओ...!

न्याय चाहिए तो जमात बनाओ...!


आलेख:श्याम किशोर पाठक
           सुशांत के हत्या बनाम आत्महत्या के बहस में जब से सीबीआई की जिरह शुरू हुई है, तब से नेपोटिज्म और वंशवाद की जगह ने प्यार/धोखा/अय्याशी/लोभ/अपराध और नशे ने ले ली है। 
अब मौत की पड़ताल के बहाने सपनों की इस नगरी को लेकर जो सच सामने आ रहे हैं, उससे यह लगने लगा है कि करोड़ों युवाओं के ख्वाबों में बसने वाला यह मुंबई नगरी और इसके स्टार्स असल में कितने गर्त में गिरे हुए हैं। 
               सुशांत की मर्डर बनाम सुसाईड की मिस्ट्री ने यह जाहिर कर दिया है कि फिल्मों में इंसानियत और ईमान की मूर्ति बनने वाले हजारों दिलों की धड़कन बने इन नायक और नायिकाओं का सच क्या है? इनका वास्तविक चरित्र क्या है? इनकी शोहरत के पीछे कौन-कौन और किस तरह के लोगों की भागीदारी रही होती है? 
              इसमें कोई संदेह नहीं कि सपनों की यह नगरी हमेशा से ही ऐसा रहा है। लेकिन सबकुछ पर्दे के पीछे होने के कारण सारे कुकर्म अब तक लोगों के आंखों से ओझल ही रहे। सच तो यह भी है कि सुशांत की मौत भी कदाचित मर्डर मिस्ट्री नहीं बनती, यदि इस मामले में फ़िल्मी दुनिया से बाहर के लोगों ने सवाल न उठाये होते! फिर जब मुंबई की पुलिस ने जांच शुरू की तो उसके जांच के तरीके ने इस मामले को और तूल दे दिया। फिर जब पुलिस के काम पर सवाल उठाये गये तो सरकार और शिवसेना वालों को तकलीफ होने लगी।
            बस, फिर क्या था! खुद को वीर मराठा मानने वाले कथित रूप से ठाकरे परिवार के परम् भक्त/ज्ञानी/संरक्षक/विघ्नहर्ता संजय राउत का रेंकना/भोंकना भी शुरू हो गया। साहब ने यह फरमाया की एक बिहारी की आत्महत्या पर न जाने लोग इतना ड्रामा क्यों कर रहे हैं। 
                इसके बाद इस बात से आहत सुशांत के परिजनों ने जहां सुशांत की हत्या की आशंका व्यक्त करते हुए पटना में एफआईआर दर्ज कराया, वहीं मुंबई के बाहर से आने वाले स्ट्रगलर और स्टारों ने भी सुशांत की मौत के मामले में महाराष्ट्र पुलिस और महाराष्ट्र सरकार की नीयत के खिलाफ बोलना शुरू कर दिया। 
ऐसे ही लोगों में एक नाम कंगना राणावत का भी है। कंगना ने सुशांत के मामले में न सिर्फ महाराष्ट्र पुलिस और महाराष्ट्र सरकार के आचरण के खिलाफ बोला बल्कि उसने इस मामले में इंडस्ट्री के लोगों के रवैये के खिलाफ भी बोला। कंगना के इसतरह खुलकर सामने आने के बाद इसके पीछे के सच को जानने की इच्छा रखने वाले देश के लाखों लोगों की मानो जैसे वह अघोषित प्रतिनिधि बन गयी। 
                इसके बाद सीबीआई के नेतृत्व में ईडी और एनसीबी की जारी पूछताछ से आने वाले फैक्ट्स ने तो जैसे कंगना को और आक्रामक बना दिया। अपनी बातों को सच मान कंगना ने बम्बईया और बाहरी/फिल्म इंडस्ट्री में नेपोटिज्म/ड्रग्स माफिया और रिया चक्रवर्ती के मामले में सरकार/शिवसेना के पूर्वाग्रह के खिलाफ मुम्बई को पीओके बताने तथा शिव सेना को सोनिया सेना वाला बयान देकर एकदम से हल्ला बोल दिया।
            फिर कंगना को दी गयी वाई श्रेणी की सुरक्षा और मुम्बई आने की उनकी घोषणा के बाद शिव सैनिकों की कंगना को यहां न आने की दी गयी चुनौती के बीच संजय राउत के हरामखोर वाले बयान ने इस मामले को पूरी तरह से राजनीतिक बना दिया।
               इसके बाद रही-सही कसर गैर जरूरी/गैर कानूनी तरीके से एमसीबी द्वारा कंगना का दफ्तर ढहाने की कार्रवाई ने पूरी कर दी। आज स्थिति यह हो गयी है कि सुशांत की मर्डर मिस्ट्री की न्याय की लड़ाई जैसे अब राजनीतिक रण और गुरुर की लड़ाई बन गयी है। जिस मामले में प्रत्यक्षतः भले बीजेपी और कांग्रेस न हों, परन्तु सुशांत के रास्ते कंगना बनाम शिव सेना की यह लड़ाई भाजपा बनाम कांग्रेस हो गयी है। जहां कांग्रेस इस पूरे मामले को मानवता/इंसानियत/न्याय और गैरबराबरी से हटाकर सीधे इसे बिहार चुनाव से जोड़कर, चुनावी लाभ के लिए किया जाने वाला भाजपा का दुष्कृत्य बताती है, वहीं भाजपा इसे कांग्रेस-शिवसेना का नैतिक पतन मानती है। जिसे न तो एक बूढ़े बाप का दर्द दिखाई देता है और न ही उसे कंगना जैसी महिला के इज्जत का ख्याल है।
              वैसे इस पूरे प्रकरण ने इतना जरूर साबित किया है कि यदि इस राजनीतिक अंधेरगर्दी में न्याय चाहते हो तो पहले जमात बनाओ। यदि लोग आपके साथ नहीं तो सरकार/कानून और न्याय भी आपके साथ नहीं। क्योंकि आज यदि सुशांत के लिए लोग मुखर न हुए होते तो उसकी मौत भी दिव्या-जिया और दिशा सालियान की मौत की तरह एक सामान्य सी आत्महत्या साबित कर दी गयी होती।
श्याम किशोर पाठक मोबाईल नंबर -8541097219/9430131399

 

न्याय चाहिए तो जमात बनाओ...!