आत्महत्या बनाम हत्या पर नेपोटिज्म बनाम इंफेडिलिटी का धुंध

आत्महत्या बनाम हत्या पर नेपोटिज्म बनाम इंफेडिलिटी का धुंध

आलेख:श्याम किशोर पाठक
देश भर के लोगों को सकते में डालने वाला सुशांत की आत्महत्या बनाम मर्डर केश सीबीआई के हाथ जाते ही लोगों को इस बात का आत्म सन्तोष हो गया है कि अब सत्य जरूर सामने आयेगा। यानि सत्य की ही जीत होगी। पर सवाल अब भी कई हैं। ऐसे कई सवाल हैं, जिसकी अनदेखी नहीं की जा सकती। बेशक तफ्तीश का एंगल अब बदलता हुआ महसूस होने लगा है। लेकिन इसके बाद भी हम अभी सीधे-सीधे इसे न तो मर्डर कह सकते हैं और न ही इसके लिए हम रिया चक्रवर्ती को अकेला हत्यारा मान सकते हैं।
आज के स्टेज में सुशांत का केश नेपोटिज्म के रास्ते डिप्रेशन से आत्महत्या होते हुए स्टारवार्स, पॉलिटिक्स, प्यार, धोखा और साजिश से होकर मर्डर की परिस्थिति में पहुंच गया है। जहां निश्चय ही अब नेपोटिज्म और आत्महत्या की बाते पीछे छूटती नजर आ रही है। अब यदि इस मामले में कोई एंगल दीखता है तो बस प्यार, धोखा और हत्या..!
बेशक सीबीआई की जाँच में सबकुछ साफ हो जायेगा। लेकिन यह भी सच है कि सुशांत के मामले में हर एक एंगल पर जांच होनी चाहिए। चाहे वह नेपोटिज्म की बात हो या सुशांत के डिप्रेशन में जाने की। बात रिया की बेवफाई की हो या दिशा सालियान की आत्महत्या की। सीबीआई जांच के दायरे में ये सारे बिंदु होने चाहिए। 
क्या सचमुच सुशांत के करियर में ऐसा कुछ हुआ था, जिससे वह इससे अलग होना चाहता था या वह डिप्रेशन में चला गया था? क्या सचमुच फिल्म इंडस्ट्री में उसके साथ भेदभाव किया गया? क्या रिया वास्तव में वैम्प की भूमिका में है? और यदि रिया ने ऐसा कुछ किया है तो इसका वजह क्या हो सकता है? सुशांत की हत्या करने या उसमें शामिल होने से आखिर उसे और क्या मिलने वाला है? या फिर रिया बड़े फिल्मवालों और पॉलिटिशियन के हाथों कहीं इस्तेमाल तो नहीं की गयी? यही नहीं, आखिर ऐसी क्या बात हो गयी जो फिल्म इंडस्ट्री अथवा सुशांत के अपने (रिया और स्टाफ) उसकी हत्या करने पर उतारू हो गए?
सवाल और भी है- मसलन, मुंबई पुलिस की भूमिका! बात दिशा सालियान की मौत की रही हो या सुशांत की, पुलिस ने इसे आत्महत्या मानने में एक मिनट की भी देरी नहीं की। आश्चर्य की बात यह है कि एक स्टार की सेक्रेटरी (दिशा सालियान) की आत्महत्या (हत्या?) से लेकर उसके कुछ ही दिन बाद उस स्टार (सुशांत) की मौत (आत्महत्या/हत्या) हो जाने पर भी पुलिस ने इस मामले में कोई और एंगल पर सोचने की जरूरत ही नहीं समझी और बेहद सरल तरीके से दोनों ही मामले में उनकी मौत को आत्महत्या मानकर अपना काम पूरा कर लिया। आखिर पुलिस को इतना फॉर्मल क्यों बनना पड़ा?
वो तो भला हो उन लोगों की जिसने इनर और आउटर को लेकर नेपोटिज्म के शिकार होने के हल्के आवाज में सुशांत के अपने और चाहनेवालों द्वारा उठायी गयी आवाज के पक्ष में अपनी आवाज मिलाते हुए इस बुराई के खिलाफ आवाज को बुलंद किया और सुशांत के परिवार को न्याय दिलाने की बात को बल प्रदान किया। अन्यथा दिव्या भारती, जिया खान और दिशा सालियान की तरह सुशांत का मामला भी एक हादसा बनकर पुलिस की डायरी में दफन हो गया होता।
क्योंकि सुशांत की मौत को लेकर शुरुआत जिन बातों से हुई उसमें हम जैसे लोगों ने भी इसे नेपोटिज्म/बड़े-छोटे और बाहरी-भीतरी की घुटन में हार जाने वाले एक कमजोर इंसान के रूप में ही सुशांत को देखा था। जिस बात को मानना बहुत असहज भी नहीं था। क्योंकि इस इंडस्ट्री/दुनिया/व्यवस्था की रीती-नीति यही है। जहां बड़ों के दबाव में सहनशक्ति क्षीण होने की स्थिति में कमजोर पड़ता हुआ छोटा आदमी खुद को मिटा लेता है। जिसे कुछ लोग इसे उसके दुःख के अंत के रूप में देखने के बजाए उसकी बुजदिली के रूप में लेते हैं। फिर सुशांत जैसा काबिल एक्टर और इंसान यदि ऐसा कदम उठाये तो इसे उसकी नासमझी ही मानी जायेगी।
बहरहाल सारे सरकारी/पुलिसिया और राजनीतिक हथकंडो के उपरांत अब जब सीबीआई ने अपना काम शुरू कर दिया है, देश इस उम्मीद में है कि जांचोपरांत जो भी होगा बिल्कुल न्यायसंगत और जनमत के अनुकूल होगा।
         
श्याम किशोर पाठक मोबाईल नंबर -8541097219/9430131399

 

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