यह कौन सी गंगा-जमुनी संस्कृति है? 

यह कौन सी गंगा-जमुनी संस्कृति है? 
 
 
आलेख:श्याम किशोर पाठक
            अब राम मंदिर निर्माण अवश्यम्भावी है। किंतु इस सच को स्वीकार करने और दिल से अंगीकार करने के बजाए अब भी कुछ लोग/ दल और समूह राजनीति करने में लगे हैं। असद्दुदीन ओवैसी जैसे कुछ लोग तो खुलेआम हिन्दू-मुस्लिम के आधार पर लोगों के मन में नफरत का बीज बोने का काम कर रहे हैं। ओवैसी जैसे लोग आज के दिन को हिंदुओं की जीत और मुस्लिमों की हार के रूप में प्रचारित करते हुए इसे हिंदुस्तान के इतिहास का काला दिन और काला अध्याय बताने में लगे हैं।
            वे अब भी सुप्रीम कोर्ट के इस फैसले को स्वीकार नहीं कर पा रहे कि कथित बाबरी मस्जिद की जगह कभी मंदिर था। ये धार्मिक/राजनीतिक जिहादी आज के जन्म भूमि मंदिर निर्माण शिलान्यास कार्य को एक तरफ हिंदुस्तान की गंगा-जमुनी संस्कृति पर हमला भी बताते हैं, वहीं दूसरी तरफ यूनिवर्सल नायक राम के जन्म स्थान पर मंदिर निर्माण को वे भारतीय इतिहास का कलुषित अध्याय भी बताते हैं।
इनकी गंगा-जमुनी संस्कृति कैसी है, ये खुद ही उसे जाहिर भी कर देते हैं। लेकिन इसके बाद भी वे यही जताते हैं कि उनके साथ अन्याय किया जा रहा है।
            अन्याय का इनका पैरामीटर भी तो देखिये, एक तरफ भगवान राम और दूसरी तरफ आक्रांता बाबर! वह लुटेरा जो कायदे से इनका अपना भी नहीं है। क्योंकि यदि ये खुद को हिंदुस्तानी (उसमें भी असली और सच्चा) मानते हैं, तो इन्हें खुद ही राम के पक्ष में होना चाहिए था। लेकिन इनकी कथनी और करनी कभी एक नहीं होता। ये तो उस बाबर के पक्ष हैं जो हिंदुस्तानियों को लूटने आया था।
गंगा-जमुनी संस्कृति का भला यह कौन सा सार है, जहां एक तरफ आस्था/ईमान/सभ्यता/जीवन और दर्शन के प्रतीक भगवान राम खड़े हैं और दूसरी तरफ एक शैतान/राक्षस और मानवता का द्रोही है। जिसने अपनी सत्ता के लिए धर्म के किसी भी आचरण का कभी पालन ही नहीं किया। लेकिन आज उसे भगवान के समकक्ष बैठा कर धर्म की रक्षा के नाम पर राजनीतिक जिहाद किया जा रहा है।
            यह विषय इतना गम्भीर और वृहद है कि इस पर चर्चा शायद कभी खत्म ही न हो। लेकिन सर्वधर्म समभाव के भाव से उत्प्रेरित धर्मनिरपेक्षता को जिस तरह से आज की भारतीय राजनीति और भारतीय मनीषा में छद्म धर्मनिरपेक्षता का जामा पहना दिया गया है, वहां चर्चा को सही दिशा देना भी मुश्किल हो गया है।
ऐसी स्थिति जहां के लोग धर्म के आधार पर देश विभाजन के बाद भी अपनेपन का वास्ता देकर हमारे बनकर हमारे ही साथ रहते हैं, पर कभी हमारी इच्छा/उत्कंठा का ख्याल नहीं रखते, उनके सम्बन्ध में हमें भी फिर से सोचने पर मजबूर करता है। 
             ऐसे हालात हमें गांधी और गोडसे प्रकरण में गोडसे के मनोभावों के प्रति सहानुभूति प्रकट करने पर भी विवश कर देते हैं। जहां ऐसे ही हालात के वश में होकर गोडसे ने गांधी जैसे राजनीतिक फकीर को भी रास्ते से हटाने पर मजबूर हो जाता है। 
            सच कहें तो आज की परिस्थितियां खिन एयर अधिक दुष्कर हैं। जहां केवल आर्थिक और राजनीतिक ही नहीं हिंदुस्तान की धार्मिक-सांस्कृतिक पहचान पर भी संकट के बादल मंडरा रहे हैं। जहां जय श्रीराम कहना हुड़दंग करना है। यह नारा असभ्यता और अधार्मिक होने का प्रमाण है। खुद को हिन्दू और हिंदुत्व का हामीदार बताना संविधानिक गुनाह का भागीदार बनाना है। 
         लेकिन इसके बावजूद आज का घटनाक्रम हमारे लिए आनंददायक और सुखकारी है, जहां मोदी जैसे महानायक और योगी जैसे अनन्य साधक ने ऐसा कुछ कर दिखाया है, जैसे मर्यादा पुरुषोत्तम भगवान श्रीराम और भक्त हनुमान ने असंख्य असुरों का नाश करते हुए धर्म की स्थापना की थी। 
जय सियाराम। जय हनुमान।
श्याम किशोर पाठक मोबाईल नंबर -8541097219/9430131399

 

यह कौन सी गंगा-जमुनी संस्कृति है?