गरीबी रेखा नहीं, अमीरी रेखा बननी चाहिए

गरीबी रेखा नहीं, अमीरी रेखा बननी चाहिए

 आज देश गंभीर आर्थिक असमानता का शिकार है। देश की कुल निजी संपत्ति का अधिकांश भाग केवल मुट्ठीभर लोगों के पास सिमट कर रह गया है जबकि शेष विशाल जनसमुदाय नितांत अभाव और दुर्दशा का जीवन जीने को मजबूर है। देश के सभी उत्पादन के साधन जैसे व्यापार,
उद्योग, कृषि, आदि सब पर इन्हीं का अधिकार है और देश की संपूर्ण अर्थव्यवस्था से मिलने वाले अतिरिक्त लाभ का अधिकांश भाग भी इन्हीं अतिसंपन्न लोगों के पास जा रहा है। इसके कारण ये लोग पूर्ण विलासिता का जीवन तो जी ही रहे हैं, इनकी आर्थिक संपन्नता भी निरंतर बढ़ती
ही जा रही है। इस कारण अनेक लोग कमरतोड़ मेहनत करने के बाद भी अपनी न्यूनतम जरूरतों को ठीक ढंग से पूरा करने योग्य धन भी प्राप्त नहीं कर पाते। समाज का बहुत बड़ा कमजोर वर्ग तो दोनों समय की रोटी को भी तरस रहा है। दो व्यक्तियों की आय में जमीन और आसमान का
अंतर है। यह अंतर अब इतना बड़ा हो चुका है कि एक व्यक्ति की एक दिन की आय दूसरे व्यक्ति की सात जन्म की आय से भी अधिक हो गई है। यदि यही न्याय है तो फिर अन्याय क्या है?
                                                यह अन्याय संपूर्ण सामाजिक व्यवस्था के ताने-बाने को बुरी तरह
से ध्वस्त कर रहा है। जैसे-जैसे यह अन्यायपूर्ण आर्थिक विषमता बढ़ रही है, वैसे ही वैसे समाज में व्यवस्था के प्रति अविश्वास, असंतोष, टकराव और विद्रोह की समस्याएं निरंतर जटिल और विनाशकारी होती जा रही हैं। नक्सलवाद, आतंकवाद, अलगाववाद, जघन्य व संगठित अपराध
व्यवस्था के द्वारा किए जा रहे अन्याय की अभिव्यक्ति या प्रतिक्रिया मात्रा हैं। जो लोग इन्हें कानून व्यवस्था की समस्या मानते हैं वे या तो मूर्ख हैं या धूर्त। रोजगार के अवसर निरंतर घट रहे हैं और बेरोजगारों की फौज भी निरंतर बढ़ती जा रही है। जैसे-जैसे बेरोजगारी बढ़ रही है वैसे ही वैसे समाज में रोष बढ़ता जा रहा है। देश की सारी संपदा, संपत्ति और संवैधानिक पदों पर नितांत स्वार्थी, धूर्त, पाखंडी, अपराधी व बेईमान लोगों का कब्जा हो गया है। ये सभी मिलकर पूरे समाज को लूट रहे हैं और इसे गुमराह भी कर रहे हैं।
                                                   सहज ही प्रश्न उठता है कि इन समस्याओं का मूल कारण और
इनका समाधान क्या है? सामाजिक व्यवस्था एक व्यापक समझौता होती है जिसका उद्देश्य सब लोगों के हितों में न्यायपूर्ण सामंजस्य की स्थापना करके उन्हें एक दूसरे के पूरक बनाना है। लोगों के हितों में होने वाले अधिकांश टकराव भी आर्थिक ही होते हैं। क्योंकि अर्थ का संबंध व्यक्ति की रोटी, कपड़ा व मकान जैसी आधारभूत आवश्यकताओं से है। न्यायपूर्ण अर्थव्यवस्था
के द्वारा ही सब लोगों की सारी आवश्यकताएं बहुत आसानी से पूरी की जा सकती हैं। किंतु यदि व्यवस्था न्याय की कसौटी पर खरी न हो तो उसका परिणाम भी अनेक प्रकार के टकरावों के रूप में सामने आता है। समाज में विद्यमान गंभीर आर्थिक व अन्य प्रकार की गंभीर समस्याओं का मूल कारण भी वर्तमान अन्यायपूर्ण अर्थ-व्यवस्था ही है।
                                               अतः समाज में सुख, समृद्धि व सुरक्षा के लक्ष्य को पाने के लिए
सबसे पहले अर्थव्यवस्था को न्यायपूर्ण बनाया जाना चाहिए। हम जब किसी भी व्यवस्था को स्वीकार करते हैं तो उसका एकमात्र मुख्य कारण उससे मिलने वाला अतिरिक्त लाभ होता है। क्योंकि तब हम एक दूसरे के कार्य में बाधक बनने की बजाए एक दूसरे के सहायक या पूरक बन जाते हैं और हर व्यक्ति को अपनी योग्यता, क्षमता और रुचि के अनुसार उपयुक्त भूमिका प्राप्त हो जाती है जिससे कठिन से कठिन काम भी अत्यंत आसान हो जाते हैं। किंतु इस प्रकार की व्यवस्था की सफलता केवल इस बात पर निर्भर करती है कि उस व्यवस्था से मिलने वाले अतिरिक्त लाभ का वितरण भी न्यायपूर्ण ढंग से हो। वर्तमान अर्थव्यवस्था का दोष यह है कि वह इससे मिलने वाले अतिरिक्त लाभ का न्यायपूर्ण वितरण नहीं करती। जिसके कारण समाज में असंतोष, अविश्वास, अभाव, बेरोजगारी, गरीबी, शोषण, अपराध और षड्यंत्रों जैसी समस्याएं उत्पन्न होती हैं। समाज में विद्यमान गंभीर आर्थिक विषमता का मूल कारण व्यवस्था से उत्पन्न होने वाले लाभ और हानियों का अन्यायपूर्ण वितरण है। कुछ मुट्ठीभर लोगों को तो उनके हक से बहुत ज्यादा हिस्सा मिल रहा है जबकि शेष लोग अपने न्यायपूर्ण हक से वंचित हो रहे हैं। इसे न्यायपूर्ण बनाने के लिए हमें सारी स्थितियों पर न्यायपूर्ण ढंग से विचार करना होगा।
                                        न्याय की दृष्टि से देश की सारी प्राकृतिक संपदा और उससे प्राप्त
संपत्तियों पर देश के सभी नागरिकों का समान अधिकार होता है। उन्हें यह अधिकार वहां जन्म लेने के कारण मिलता है, न कि अपनी किसी विशेष योग्यता, क्षमता या पुरुषार्थ के कारण। इसलिए इस अधिकार को न तो घटाया जा सकता है और न ही बढ़ाया जा सकता है। अतः न्याय के आधार पर एक व्यक्ति का मूलभूत संपत्ति अधिकार केवल औसत सीमा तक की
संपत्ति पर ही हो सकता है। क्योंकि इससे अधिक अधिकार प्रदान करने का अर्थ किसी अन्य व्यक्ति के साथ अन्याय करना होगा। दूसरी बात यह है कि व्यक्ति की योग्यता, क्षमता या अन्य किसी विशेषता के आधार पर मूलभूत अधिकार को कम या अधिक करने से उसका स्वरूप जिसकी लाठी, उसकी भैंस जैसा हो जाएगा और जंगल के कानून की तरह शक्तिशाली लोग कमजोर लोगों के सारे न्यायोचित अधिकारों का हनन कर देंगे। उसे न्यायपूर्ण कहना न्याय का मखौल उड़ाना ही होगा। न्याय की दृष्टि से कोई व्यक्ति चाहे कितना भी अधिक योग्य पुरुषार्थी या सर्वगुण संपन्न क्यों न हो, फिर भी उसके अधिकार की एक अधिकतम सीमा का निर्धारण तो करना ही होगा। किंतु वर्तमान व्यवस्था किसी भी व्यक्ति के अधिकतम संपत्ति अधिकारों की किसी भी अधिकतम सीमा को स्वीकार नहीं करती। इसके कारण शक्तिशाली व्यक्ति निरंतर अधिक शक्तिशाली होता चला जाता है तथा कमजोर व्यक्ति निरंतर कमजोर होता चला जाता है, इसी का परिणाम समाज में गंभीर आर्थिक विषमता के रूप में सामने आ रहा है।
                     एक व्यक्ति के अधिकतम संपत्ति अधिकार की सीमा का निर्धारण
करना इसलिए भी आवश्यक है क्योंकि उत्पादन और विनिमय के कामों में साधनों की अत्यंत महत्वपूर्ण भूमिका होती है। किसी भी प्रकार का उत्पादन केवल श्रम के बल पर नहीं किया जा सकता। साधनों के बल पर ही कठिन से कठिन कामों को भी कम से कम श्रम में ही आसानी
से पूरा किया जा सकता है जबकि साधनों के अभाव में बहुत आसान कामों को कर पाना भी अत्यंत कठिन या असंभव हो जाता है। वर्तमान अर्थव्यवस्था को देखकर इस सत्य को आसानी से समझा जा सकता है कि भौतिक विज्ञान की उन्नति के कारण आज पूरी अर्थव्यवस्था ही नहीं बल्कि संपूर्ण सामाजिक व्यवस्था साधनों पर ही टिक गई है। अत्यंत शक्तिशाली यंत्रों और उपकरणों के आविष्कार ने उत्पादन और विनिमय की सारी पुरानी स्थितियों को पूरी तरह बदलकर रख दिया है। अब साधनों की भूमिका ही मुख्य हो गई है और मानवीय श्रम की भूमिका नितांत गौण। इसके कारण व्यक्ति की आय का संबंध उसके श्रम से न होकर उसके साधनों से स्थापित हो गया है। श्रम की भूमिका के घट जाने का दुष्परिणाम ही श्रम की आय पर निर्भर रहने वाले लोगों की गरीबी, बेरोजगारी, अभाव व शोषण के रूप में सामने आ रहा है। यह पूरे तौर पर स्पष्ट दिखलाई देता है कि अब लोगों की अमीरी उनकी बुद्धि , श्रम या पुरूषार्थ के बल पर नहीं बल्कि उनके साधनों के कारण ही बढ़ रही है। सारी संपत्ति व साधनों का निरंतर केंद्रीयकरण हो रहा है और वे केवल कुछ लोगों के पास सिमटते जा रहे हैं। यह एक
अत्यंत भयावह और खतरनाक स्थिति है जिसका अंतिम परिणाम बहुत ही विनाशकारी हो सकता है।
                     अतः समाज को सुखी बनाने के लिए अब समाज में एक अमीरी
रेखा बननी चाहिए, न कि गरीबी रेखा। न्याय के आधार पर समाज में योग्यतम व्यक्ति को अधिकतम अधिकार तथा अयोग्यतम व्यक्ति के न्यूनतम अधिकार परिभाषित होने चाहिए। इसके बिना कमजोर व्यक्ति के मूलभूत अधिकारों की रक्षा नहीं की जा सकती। वैसे भी व्यवस्था को
खतरा योग्य या शक्तिशाली व्यक्ति से ही होता है। अतः गरीबी रेखा बनाना या तो अज्ञानता है या समाज को धोखा देने का प्रयास। अब अमीरी रेखा बनाना इसलिए भी आवश्यक हो गया है क्योंकि भौतिक विज्ञान की उन्नति के कारण और नित नए-नए आविष्कारों और खोजों के कारण नए-नए शक्तिशाली यंत्रा और उपकरणों की संख्या लगातार बढ़ती जा रही है। इससे उत्पादन और विनियम के सभी क्षेत्रों में वे मानव का स्थान लेते जा रहे हैं। जिससे मानवीय श्रम की भूमिका ही घटती जा रही है। इसके कारण श्रम पर आधारित रोजगार भी लगातार घटते जा रहे हैं। इसकी अंतिम परिणति श्रम पर आधारित रोजगारों का पूरी तौर पर समाप्त हो जाना है। केवल मशीनों के बल पर भारी मात्रा में इतना उत्पादन तो हो जाएगा जो सब लोगों की उपभोग की आवश्यकताओं को पूरा करने के लिए पर्याप्त होगा। किंतु उन लोगों का क्या होगा जो
मानवीय श्रम की भूमिका समाप्त हो जाने से पूरी तरह बेरोजगार हो जाएंगे और उनके पास जिंदा रहने के लिए आय का कोई साधन नहीं होगा। यह एक अत्यंत भयावह स्थिति होगी जिस पर समय रहते विचार करना न केवल सामाजिक बल्कि मानवीय उत्तरदायित्व भी है।
यह भी विचारणीय प्रश्न है कि ऐसे आजीविकाहीन लोगों का समाज में प्रतिशत कितना होगा? इसका उत्तर यह है कि आज शक्तिशाली यंत्रों और उपकरणों के द्वारा एक ही व्यक्ति के श्रम से कई गुना उत्पादन हो रहा है। पहले जिस काम को करने के लिए भारी संख्या में मनुष्यों
की जररूत होती थी अब उसे 10 या 20 प्रतिशत लोगों के द्वारा सरलता से पूरा किया जा रहा है। आने वाले समय में जैसे-जैसे प्रौद्योगिकी अधिक उन्नत होगी, इससे भी कम लोगों के द्वारा ही इससे भी अधिक मात्रा में उत्पादन कर पाना संभव हो जाएगा। अतः हम यह कह सकते
हैं कि मात्रा 5 या 10 प्रतिशत लोग ही इतनी भारी मात्रा में उत्पादन कर सकेंगे जो सभी 100 प्रतिशत लोगों के उपभोग की जरूरतों को पूरा करने के लिए पर्याप्त हो। किंतु यह अलग बात है कि इस कारण कम से कम 90 प्रतिशत लोगों के पास आय का कोई ड्डोत न रहने के कारण उनकी कोई क्रय शक्ति नहीं रह जाएगी। यह एक भीषण मानवीय त्रासदी होगी। किंतु इसका परिणाम संपन्न लोगों के लिए भी विनाशकारी ही होगा।
 
                                   क्योंकि तब उनके विशाल उत्पादन का कोई क्रेता नहीं होगा। एक तरपफ उत्पादनों के गोदाम भरे होंगे तो दूसरी ओर 90 प्रतिशत लोगों के पेट खाली होंगे। उत्पादक अपना उत्पादन बेचने के लिए अनुचित प्रतिस्पर्धा का सहारा लेने के लिए मजबूर हो जाएंगे और अंततः वे भी आपस में कट मरेंगे। अर्थव्यवस्था के लिए भी यह भयानक स्थिति होगी। इन सारी भयानक स्थितियों से बचने का सर्वश्रेष्ठ और न्यायपूर्ण उपाय अमीरी रेखा ;समृद्धि रेखा या समता रेखा बनाना है। जैसा कि पहले कहा जा चुका है कि न्याय के आधार पर एक आदमी को केवल औसत सीमा तक संपत्ति रखने की स्वतंत्राता या अधिकार होना चाहिए। जिसे मूलभूत संपत्ति का अधिकार माना जाए और इससे अधिक संपत्ति के लिए उसे उसका मालिक न मानकर केवल प्रबंधक माना जाए जो उस अधिक संपत्ति के लिए समाज का कर्जदार हो। ऐसा इसलिए माना जाना चाहिए क्योंकि मूल रूप से सारे प्राकृतिक संसाधनों और संपत्ति पर
समाज का समान स्वामित्व है। 
                               अतः भले ही कोई व्यक्ति अपनी अधिक योग्यता, प्रतिभा या पुरुषार्थ के बल पर अधिक मात्रा में संपत्ति अ£जत करने की क्षमता रखता हो, किन्तु उसके द्वारा अध्कि मात्रा में संपत्ति संचय करने से शेष लोगों के लिए संपत्ति की मात्रा घट जाती है। जिससे उनके मूलभूत अधिकार का हनन होता है। अतः अधिक क्षमतावान व्यक्ति अधिक आय प्राप्त करने के लिए और उसका उपयोग करने के लिए तो स्वतंत्रा होना चाहिए किंतु मूलभूत अधिकार की तरह संचित करने के लिए नहीं। उसने अपनी प्रतिभा या योग्यता के बल पर केवल प्राकृतिक संसाधनों का रूपांतरण किया है, न कि स्वतंत्रा निर्माण। अर्थात् उसने इसके लिए जिन प्राकृतिक संसाधनों का उपयोग किया है, उन पर उसका नहीं बल्कि किसी अन्य व्यक्ति का अधिकार है। अतः उन पदार्थों के रूपांतरण में लगने वाले श्रम का भाग ही उसे मिलना चाहिए और प्राकृतिक साधनों के मूल्य का भाग उन प्राकृतिक संसाधनों के स्वामियों  को मिलना चाहिए, जो उनके मूल मालिक हैं।
                                           इस बात को समझने के लिए बटाईदार का उदाहरण देना उचित होगा। बटाईदार उस व्यक्ति को कहते हैं जिसके पास अपनी कोई भूमि नहीं होती। अतः वह भूमि के स्वामी से भूमि लेता है और उससे प्राप्त होने वाले उत्पादन का एक भाग भूमि के स्वामी को प्रदान करता है। हालांकि भूमि का स्वामी कोई श्रम नहीं करता पिफर भी भूमि का मालिक
होने के कारण वह उत्पादन का एक भाग प्राप्त करता है और शेष भाग मेहनत के बदले मंे बटाईदार का मान लिया जाता है। अतः अपने अधिकार की सीमा से अधिक धन के लिए भी व्यक्ति को उस धन का बटाईदार ही माना जाना चाहिए और उससे स्वामित्व के अधिकार का
हिस्सा समाज को मिलना चाहिए।
                                         अतः एक नागरिक को केवल औसत सीमा तक संपत्ति रखने का मूलभूत अधिकार होना चाहिए और उससे अधिक संपत्ति पर ब्याज की दर से टैक्स लगना चाहिए। उसे इस अधिक संपत्ति का किराया या रायल्टी भी कह सकते हैं। इस तरह ब्याज की दर से टैक्स या रायल्टी लगाना इसलिए न्यायोचित है क्योंकि ब्याज संपत्ति से मिलने वाला वह
अतिरिक्त लाभ होता है, जिसका व्यक्ति के श्रम से कोई संबंध नहीं होता। अन्य सभी प्रकार के करों को समाप्त कर दिया जाना चाहिए और संपत्ति कर से प्राप्त राशि में से सरकार के बजट का खर्च काटकर शेष राशि को देश के सारे नागरिकों में समान रूप से लाभांश के रूप में बांट
दिया जाना चाहिए।
                                      ऐसा करने से न केवल अर्थव्यवस्था को वर्तमान अनेकों प्रकार की
विसंगतियों, विकृतियों, कठिनाइयों, बाधाओं, अपव्ययों, अस्पष्टताओं, अंतर्विरोधों और झूठ बोलने की मजबूरियों से छुटकारा मिल जाएगा बल्कि विकास के कारण उत्पन्न होने वाले अतिरिक्त लाभ में भी सब लोगों को उनका न्यायोचित भाग प्राप्त हो जाएगा। इससे हर व्यक्ति को
सम्मान के साथ अभाव मुक्त जीवन जीने के लिए आय का स्त्रोत भी मिल जाएगा जिससे रोजगारों के समाप्त हो जाने के कारण पैदा होने वाली जटिल मानवीय व सामाजिक समस्या का भी सरलतम समाधान होगा। इससे आम आदमी की क्रय शक्ति में भारी वृद्धि हो जाएगी। इससे हर उत्पादक के उत्पादन की भारी मांग पैदा होगी जिससे कृषि, दुग्ध, उद्योग व व्यापार में लगे लोगों के काम में भारी वृद्धि होगी। उनका हर सामान मुंह मांगे दामों पर बिकेगा जिससे वे भारी आर्थिक लाभ भी अर्जित कर सकेंगे। अनेक प्रकार के करों के समाप्त होने से उनको अपना उत्पादन करने के लिए अधिक समय मिल सकेगा। अनेक करों के कारण उन्हें खाता बही व बिल बाउचर आदि रखने की परेशानियों से मुक्ति मिलेगी। शासकों और प्रशासकों के द्वारा किए जाने वाले अनुचित हस्तक्षेप, अपमान व भयादोहन भी समाप्त हो जाएंगे। वे पूरी सच्चाई के
साथ अपने कार्यों का संचालन कर सकेंगे।
                                         सभी नागरिकों को अपनी योग्यता और प्रतिभा को बढ़ाने व समाज
में अपनी योग्यता के अनुसार स्थान प्राप्त करने के लिए समान अनुकूल अवसर प्राप्त होंगे। हर व्यक्ति स्वावलंबी होगा और योग्यता और रुचि के अनुसार अपनी भूमिका का चयन कर सकेगा। लोगों के बीच विद्यमान जाति, संप्रदाय, लिंग, भाषा, पेशा व अन्य प्रकार के वर्गीय भेदभाव समाप्त
हो जाएंगे। हर व्यक्ति जन्म से लेकर मृत्यु तक आर्थिक दृष्टि से पूरी तरह सुरक्षित रहेगा। सबको अपना पेट भरने के लिए कोई अनचाहा या अनुचित काम नहीं करना होगा। समाज में शोषण करने, धोखा देने या किसी की मजबूरी का अनुचित लाभ उठाने की प्रवृत्ति पर अंकुश लगेगा। देश में कोई भी व्यक्ति लाचार, गरीब या अन्याय का शिकार नहीं होगा। भीख मांगने,
चोरी करने, नशीले पदार्थ या वेश्यावृति जैसे घृणित कार्य नहीं करने होंगे। सरकार को भी राजस्व की कमी को पूरा करने के लिए शराब या गांजे जैसी खराब चीजों को बिकवाने की मजबूरी से मुक्ति मिलेगी। देश का हर व्यक्ति संपन्न होगा। देश की अर्थव्यवस्था अत्यंत मजबूत होगी और नई ऊंचाइयों को छुएगी। चारों ओर परस्पर सद्भाव, सहयोग, विश्वास व सन्तोष का वातावरण बनेगा। सम्पत्ति के प्रति अत्यंत लालच व मोह में कमी आएगी। हर व्यक्ति व्यवस्था के प्रति श्रद्धा रखेगा और सच्चाई के साथ उसका पालन करना अपना धर्म या कत्र्तव्य मानेगा। नक्सलवाद, आतंकवाद, अपराध व अन्य आपराधिक कृत्यों की प्रवृत्ति समाप्त होगी। समाज में
परस्पर एकता व प्रेम मजबूत होंगे। प्रकृति का अनुचित विनाश नहीं होगा। पर्यावरण प्रदूषण से मुक्ति मिलेगी। शहरों पर आबादी का दबाव घट जाएगा और उजडे़ गांव बस जाएंगे।

आलेख :- आर्थिक चिंतक,रौशन लाल अग्रवाल,मोबाइल :-09302224440
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