दूर बसी बिटिया

दूर बसी बिटिया !

 


रचना-डॉ. सरस्वती जोशी
ओ मेरी दूर बसी बिटिया !
हर बार जब सुनती हूँ,
तेरे फोन की मधुर गुँजार।
नहीं, नहीं, लगता है :
मैं बनावटी हो गई हूँ।
कितना बड़ा झूठ !
आती नहीं क्या लाज मुझे !
टन-टन को कहते मृदु गुंजार !
क्योंकि सच तो यह है कि,
जैसे ही कानों में पड़ता :
टनन, टनन, टनन...
मेरा हृदय सूखा सा, 
पथराया सा, रह जाता है सुन्न !
मानों कहीं कुछ ठहर गया है।
सोचती हूँ... चाहती हूँ...
मिल जाए मुझे एक पल,
सोचने को : क्या कहूँगी मैं तुझे ?
पूछने को तेरी कुशल !
जानती हूँ : होना चाहिये कितना-कुछ,
कहने को तुझे, पर यह क्या !
क्या सचमुच मैं इतनी निर्धन,
हो गई ऐसी भिखारिन !
कि सब कुछ ही गया चुक !
औ पास नहीं बचा कुछ !
क्या मेरे पास बहते निर्झर की,
सूखी रेत भी नहीं ?
और यदि है, तो फिर,  
कुछ भी कहने को,
न होने की टीस का,
अहसास क्यों जाता नहीं ?
मुझे पता है, तू कहेगी :
(बस केवल कुछ कहने को।
इसीलिये कि कहने के लिये,
कहीं कुछ तो चाहिये।)
"मैंने बदल दिया है,
अपने कमरे का कालीन, 
रसोई की छत का रंग।
करदी है मैंने अपने बगीचे की,
बाड़ की शाखों की कटिंग।..."
क्योंकि तेरे बुद्धि जीवी पक्ष के,
गहन पहलू को समझ पाने की,
मुझमें क्षमता नहीं।
तू इसे जानती है, मानती है, 
पर फिर भी, कोसों की दूरी के,
अंतराल को भरने के लिये,
इस टन-टन में स्वर भर कर,
कुछ तो कहना ही चाहिये।
मुझे बहलाने के लिये।
मेरे पागल प्यार को,
ठेस न लगाने के लिये।
मेरा मनोबल टूट ना जाए।
मेरी इन बूढ़ी आँखों से,
कुछ बूँदें कहीं ढुलक ना जाएँ।
इसके लिये कितना ज़रूरी 
है के तू मुझको बहलाए।
ज्ञात है तुझको यह सब कुछ,
पर तुझे कैसे बताऊँ ?
सचमुच चेतन हूँ कहाँ मैं ?
और जड़ रोते कहाँ हैं ?
नहीं तो उन ठंडी रातों में,
एक प्याली दूध को,
रोते-सुबतते देख कर भी,
मैं क्यों भला पिघली नहीं !
सच कहती हूँ ! मैं माँ नहीं,
चेतन नहीं, पंचतत्व का जड़ पदार्थ हूँ,
पर यह सत्य कहीं पर खुल ना जाए !
नहीं तो... लोग शव को घर में रखते नहीं।
और मुझे जड़ होने पर भी,
जाने क्यों है इतना मोह,
तेरे इस घर से।
देखो ! फिर मैं चूक गई,
कितना बड़ा झूठ है यह सब !
क्या सचमुच हूँ इसे मानती,
के यह है तेरा ही घर अब ?
है तुझे मालूम यह सब।
फिर भी तू मुझे बहलाएगी।
और रखेगी एक मौका,
मुझको यही दिखलाने का।
"तू समझ कर भी अनजान है।"
यह मुझको जतलाने का।
और तेरी टन-टन पर,
एक पल को रुके,
उस क्षण को आगे बढ़ाने का।
"मैं तुझको बहुत प्यार करती हूँ,"
यह मुझको समझाने का।
क्योंकि मैं जैसी भी हूँ, तेरी माँ हूँ !
तू मुझे मनसे जानती है !
पूरी तरह पहचानती है !
-  डा० सरस्वती जोशी, पैरिस, फ़्रांस 
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