सुप्रीम कोर्ट ही सुलझा सकता है  राजनीति के अपराधीकरण की समस्या 

सुप्रीम कोर्ट ही सुलझा सकता है  राजनीति के अपराधीकरण की समस्या 


 
आलेख:-  सुरेंद्र किशोर (वरिष्ठ पत्रकार स्वतंत्र लेखन)
सुप्रीम कोर्ट ने ठीक ही कहा है कि 
‘‘लगता है कि अपराधियों को राजनीति में आने और चुनाव लड़ने से रोकने के लिए विधायिका कुछ नहीं कर सकती।’’
वैसे भी जिस देश की राजनीति,सरकार और विधायिका आपराधिक पृष्ठभूमि वाले उम्मीदवारों के संपत्ति-शिक्षा-आपराधिक मामलों का विवरण सार्वजनिक करने के खिलाफ रही हो,वह राजनीति के अपराधीकरण के खिलाफ कैसे जा सकती है !
(यदि आप आज उम्मीदवारों के संपत्ति,शिक्षा और आपराधिक मामलों के विवरण जान पाते हैं तो वह सुप्रीम कोर्ट के सन 2002 के एक निर्णय का ही सुफल है।)
ठीक उसी तरह विवादास्पद सांसद-विधायक फंड को समाप्त करने में भी इस देश की सरकारें असमर्थ हैं।
उसकी बुराइयों को देखते हुए यह काम भी देर-सवेर सुप्रीम कोर्ट को ही करना पड़ेगा।
(अपवादों को छोड़कर राजनीति व अफसरशाही को निर्भीक कमीशनखोर बना देने का पूरा श्रेय सांसद-विधायक फंड को जाता है।) 
जिस तरह सुप्रीम कोर्ट ने उलझे हुए अयोध्या विवाद को हल किया,उम्मीद की जाती है कि उसी तरह वह इन दोनों मामलों को भी एक दिन जरूर देखेगा।
ये दो चीजें राजनीति और शासन को घुन की तरह खा रही हैं।
सुप्रीम कोर्ट को चाहिए कि वह न सिर्फ विधायक-सांसद फंड को समाप्त करने का सख्त निदेश दे बल्कि उसे चुनाव आयोग को भी एक खास निदेश देना चाहिए।
हत्या, बलात्कार और राजद्रोह जैसे संगीन मामलों के आरोपियों के नामांकन पत्रों को चुनाव आयोग अस्वीकार कर दे,ऐसा प्रबंध सुप्रीम कोर्ट करे। 
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कानून-व्यवस्था की विफलता 
की देन है राजनीति का अपराधीकरण
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राजनीति का अपराधीकरण, कानून-व्यवस्था की विफलता की उपज है।
इसके लिए क्रिमिनल जस्टिस सिस्टम को बेहतर बनाना होगा।
इस दिशा में भी सुप्रीम कोर्ट को ही पहल करनी होगी।
कई बार ऐसा होता है कि प्रशासन, पुलिस व अदालतें जब न्याय नहीं दे पातीं तो पीड़ित व्यक्ति कई बार बाहुबलियों की शरण में चलेे जाते हैं।
एकपक्षीय ही सही, लेकिन बाहुबली कई बार उन्हें त्वरित न्याय दिलाता है।
इस तरह वह अनेक लोगों का चहेता बनता जाता है।
उनमें से कुछ बाहुबलियों को एक दिन लोग विधायक या सांसद भी बना देते हैं।
अब सवाल है कि क्रिमिनल जस्टिस सिस्टम बेहतर कैसे होगा ?
इसके लिए ऐन केन प्रकारेण अदालती सजाओं का प्रतिशत बढ़ाना होगा।
इस दिशा में शासन को सुप्रीम कोर्ट खास-खास निदेश दे सकता है।
किंतु उससे पहले खुद सुप्रीम कोर्ट को कम से कम दो काम करने होंगे।
वह आरोपियों के नार्को टेस्ट,पाॅलिग्राफी, ब्रेन मैपिंग और डी.एन.ए.टेस्ट कराने की अनुमति जांच एजेंसी को दे दे।
अभी तो सुप्रीम कोर्ट का वह आदेश लागू है जिसके तहत सुप्रीम कोर्ट ने कहा था कि आरोपी की मर्जी के बिना उसके ऐसे टेस्ट नहीं हो सकते।
यह सुविधा जब जांच एजेंसियों को मिल जाएगी तो सजा का प्रतिशत बढ़ जाएगा।
साथ ही, पहले से जारी इस ‘न्याय शास्त्र’ को बदलना होगा कि ‘‘भले 99 दोषी छूट जाएं, किंतु किसी एक निर्दोष को भी सजा नहीं होनी चाहिए।’’
अब यह नीति शास्त्र अपनाना होगा कि
‘‘किसी भी कीमत पर एक भी दोषी छूटने न पाए।’’

 

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